तीखी कलम से

मेरे बारे में

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जी हाँ मैं आयुध निर्माणी कानपुर रक्षा मंत्रालय में तकनीकी सेवार्थ कार्यरत हूँ| मूल रूप से मैं ग्राम पैकोलिया थाना, जनपद बस्ती उत्तर प्रदेश का निवासी हूँ| मेरी पूजनीया माता जी श्रीमती शारदा त्रिपाठी और पूजनीय पिता जी श्री वेद मणि त्रिपाठी सरकारी प्रतिष्ठान में कार्यरत हैं| उनका पूर्ण स्नेह व आशीर्वाद मुझे प्राप्त है|मेरे परिवार में साहित्य सृजन का कार्य पीढ़ियों से होता आ रहा है| बाबा जी स्वर्गीय श्री रामदास त्रिपाठी छंद, दोहा, कवित्त के श्रेष्ठ रचनाकार रहे हैं| ९० वर्ष की अवस्था में भी उन्होंने कई परिष्कृत रचनाएँ समाज को प्रदान की हैं| चाचा जी श्री योगेन्द्र मणि त्रिपाठी एक ख्यातिप्राप्त रचनाकार हैं| उनके छंद गीत मुक्तक व लेख में भावनाओं की अद्भुद अंतरंगता का बोध होता है| पिता जी भी एक शिक्षक होने के साथ साथ चर्चित रचनाकार हैं| माता जी को भी एक कवित्री के रूप में देखता आ रहा हूँ| पूरा परिवार हिन्दी साहित्य से जुड़ा हुआ है|इसी परिवार का एक छोटा सा पौधा हूँ| व्यंग, मुक्तक, छंद, गीत-ग़ज़ल व कहानियां लिखता हूँ| कुछ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होता रहता हूँ| कवि सम्मेलन के अतिरिक्त काव्य व सहित्यिक मंचों पर अपने जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों को आप तक पहँचाने का प्रयास करता रहा हूँ| आपके स्नेह, प्यार का प्रबल आकांक्षी हूँ| विश्वास है आपका प्यार मुझे अवश्य मिलेगा| -नवीन

मंगलवार, 5 सितंबर 2017

ग़ज़ल - आप क्या हैं इसे जानता कौन है

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पूछिये  मत   यहां   गमज़दा   कौन   है ।
पूछिये    मुद्दतों    से   हँसा   कौन   है ।।

वो तग़ाफ़ुल  में  रस्में  अदा  कर  गया ।
कुछ  खबर  ही  नहीं  लापता कौन है ।।

घर बुलाकर  सनम  ने बयां  कर दिया ।
आप आ  ही गये तो  ख़फ़ा  कौन  है ।।

इस तरह कोई बदला है  लहजा  कहाँ ।
आपके   साथ  में   रहनुमा   कौन  है ।।

आज तो बस  सँवरने  की  हद  हो गई ।
यह  बता  दीजिए  आईना   कौन   है ।।

अश्क़ आंखों से छलका तो कहने लगे ।
ढल   गई  उम्र  अब   पूंछता  कौन  है ।।

यूँ   भटकता  रहा  उम्र  भर   इश्क  में ।
पूछता   रह   गया   रास्ता   कौन    है ।।

मैंने ख़त में उसे जब ग़ज़ल लिख दिया ।
फिर  सवालात  थे  ये  लिखा  कौन है ।।

दीजिये  मत  खुदा  की  कसम बेसबब ।
अब  खुदा  को  यहां   मानता  कौन है ।।

है  जरूरी  तो  घर  तक   चले   आइये ।
आप  क्या  हैं  इसे  जानता   कौन   है ।।

             -- नवीन मणि त्रिपाठी
              मौलिक अप्रकाशित

शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

ग़ज़ल - शायद कोई नशा है यहां इंकलाब में

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आ   जाइये   हुजूर   जरा  फिर  हिजाब  में ।
ठहरी   बुरी   नजर  है  यहां  माहताब  में ।।

बच्चों  की  लाश पर है तमाशा  जनाब  का ।
औलाद  खो   रहे  किसी  खानाखराब  में ।।

अंदाज आपके  हैं बदलते  अना  के  साथ ।
शायद  कोई   नशा  है  यहां  इंकलाब  में ।।

सत्ता मिली  जो आपको  चलने लगे  हैं दौर ।
डूबे   मिले हैं  आप  भी  महंगी  शराब  में ।।

खामोशियों  के  बीच  जफा  फिर जवाँ हुई ।
आंखों  ने अर्ज कर  दिया  लुब्बे लुआब में ।।

यूँ  ही किया  था जुर्म वो दौलत के नाम पर ।
दो  गज जमीं हुई  है मयस्सर  हिसाब  में ।।

पूछा  वतन का हाल मियां खत को भेजकर।
आया न कोई खतभी अभी तक जबाब में।।

अफसर बिके  हैं  खूब  यहां आंख  बन्द है ।
धब्बा  लगा  रहा  है  कोई  आफ़ताब   में ।।

सारा  यकीन  ढह  गया   हालात  देखकर ।
मिलने  लगे  हैं  जुर्म  भी  अपने शबाब में ।।

रहबर  तेरा  गुनाह  भी  दुनियां को है पता ।
छुपता  है  देर तक  नहीं  चेहरा नकाब  में ।।

उतरा  है  रंग  आपका  तीखे  लगे  सवाल ।
हड्डी  मिली  है आपको  जब से कबाब  में ।।

              -- नवीन मणि त्रिपाठी 
               मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल --वो तेरा छत पर बुलाकर रूठ जाना फिर कहाँ

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वो  तेरा  छत  पर   बुलाकर  रूठ  जाना   फिर  कहाँ ।
वस्ल  के एहसास  पर   नज़रें   चुराना  फिर  कहाँ ।।

कुछ ग़ज़ल में थी कशिश कुछ आपकी आवाज थी ।
पूछता  ही   रह   गया  अगला  तराना  फिर  कहाँ ।।

आरजू   के   दरमियाँ  घायल  न   हो   जाये   हया ।
अब   हया  के   वास्ते  पर्दा   गिराना  फिर   कहाँ ।।

कातिलाना   वार   करती   वो  अदा   भूली   नहीं ।
शह्र  में  चर्चा   बहुत  थी अब निशाना फिर कहाँ ।।

तोड़ते  वो  आइनों   को   बारहा   इस   फिक्र  में । 
लुट  गया  है  हुस्न  का  इतना खज़ाना फिर कहाँ ।।

था   बहुत   खामोश   मैं  जज़्बात  भी  खामोश थे ।
पढ़  लिया  उसने  मेरे दिल  का फ़साना फिर कहाँ ।।

खो  गए  थे  इस  तरह  हम  भी  किसी  आगोश में ।
याद  आया  वो  ज़माना   पर  ठिकाना   फिर कहाँ ।।

उम्र  की  दहलीज  पर   यूँ  ही   बिखरना  था   मुझे ।
वो  लड़कपन ,वो  जवानी, दिन  पुराना  फिर  कहाँ ।।

ढल  चुकी  हैं  शोखियाँ  अब  ढल  चुके  अंदाज  भी ।
अब   हवाओं   में   दुपट्टे    का  उड़ाना   फिर   कहाँ ।।

हुस्न   की  जागीर  पर  रुतबा  था  उसका   बेमिसाल।
झुर्रियों  की  कैद  में   अब  भाव   खाना  फिर  कहाँ ।।

मैकदों   की  राह  से  ग़ुज़रा   तो   ये   आया   खयाल ।
शरबती  आंखों  से  अब  पीना   पिलाना  फिर   कहाँ ।।

            नवीन मणि त्रिपाठी
            मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल - जिस्म था क्या मेरा खेलने के लिए

इक  नज़र  क्या  उठी  देखने  के लिए ।
चाँद  छिपता  गया  फासले  के  लिए ।।

कोई   सरसर   उड़ा  ले   गई  झोपड़ी ।
सोचिये  मत  मुझे   लूटने    के  लिए ।।

मौत मुमकिन  मेरी  उसको आना ही है ।
दिन  बचे   ही  कहाँ   काटने  के  लिए ।।

जहर  जो  था   मिला  आपसे  प्यार में ।
लोग    कहते   गए   घूँटने   के   लिए ।।

रात  आई   गई   फिर   सहर  हो   गई ।
याद   कहती  रही  जागने   के    लिए ।।

जब   रकीबो   से  चर्चा   हुई   आपकी ।
फिर  पता  मिल  गया  ढूढने  के  लिए ।।

सज के आए हैं महफ़िल में  मेरे सनम ।
इक  नज़र  भर  मेरी  फेरने  के   लिए ।।

कहकशां   से   भी  आवाज़ आई   बहुत ।
चाँद  क्यों  छल   रहा   जीतने के  लिए ।।

यह  बताकर  जरा   तोड़िये दिल  मेरा ।
जिस्म  था  क्या  मेरा  खेलने  के लिए ।।

ग़ज़ल - कसम से वफ़ा की फ़ज़ीहत न होती

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अगर  मेरे  दिल  पे  हुकूमत  न  होती ।
तो फिर आपकी भी रियासत न होती ।।

पलट जाती कश्ती  भी  तूफां  में  मेरीे ।
मेरे   पास  उनकी  नसीहत  न  होती ।।

बहुत  कुछ  बदलते फ़िजा के  नज़ारे ।
अगर आपकी कुछ सियासत न होती ।।

जरा सा भी वो थाम  लेते  जो  दामन ।
यहां  आसुओं की  इज़ाफ़त  न होती ।।

वो  मेरा   सुकूँ  भी  मेरे  साथ   रहता ।
अदाओं  में  थोड़ी  शरारत  न  होती ।।

वो इंसाफ करता न अब तक  जहां में ।
कहीं  भी खुदा की  इबादत न  होती ।।

बरसते न बादल भी प्यासी जमीं पर ।
अगर आपकी कुछ इज़ाज़त न होती।।

मुहब्बत के  रिश्ते  न  होते  सलामत ।
तो  फिर ताज जैसी इमारत न होती ।।

यूँ लहरा के जुल्फ़े  न  करतीं नुमाइश ।
तो अहले  चमन  में कयामत न होती ।।

तुम्हें   बेवफा  मान  लेते   जो   पहले ।
कसम से वफ़ा की फ़जीहत  न होती ।।

          -- नवीन मणि त्रिपाठी

ग़ज़ल - माना कि तेरे दिल की इनायत भी बहुत थी

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माना कि तेरे दिल  की  इनायत  भी बहुत थी ।
पर साथ इनायत के हिदायत  भी  बहुत थी ।।

आते  थे  वो  बेफिक्र  मेरे   शहर  में  अक्सर ।
तहजीब  निभाने  की  रवायत  भी  बहुत थी ।।

महंगे  मिले  हैं  लोग  मुहब्बत   के  सफ़र   में ।
यह बात अलग है  कि  रिआयत भी  बहुत  थी।।

चेहरे   को   पढा  उसने कई बार   नज़र   से ।
महफ़िल में तबस्सुम की किफ़ायत भी बहुत थी ।।

वो  हार  गए  फिर  से   अदालत   में   सरेआम ।
हालाकि  नजीरों  की  हिमायत  भी  बहुत  थी ।।

छूटी  हैं  किताबें   भी  वही   उस  से  अभी  तक ।
जिस पर लिखी कुरआन की आयत भी बहुत थी ।।

क्यों   पूछ  रहे  हैं   मेरे  दिल  का   वो   फ़साना ।
उनको तो  मुहब्बत  से  शिकायत भी  बहुत  थी ।।

            ---नवीन मणि त्रिपाठी
             मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल --बदलनी अब तुम्हें सरकार है क्या

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नया    चेहरा   कोई   दरकार  है  क्या ।
बदलनी अब  तुम्हें  सरकार  है  क्या ।।

बड़ी मुश्किल से रोजी मिल  सकी  है ।
किया  तुमने  कोई  उपकार  है  क्या ।।

सुना  मासूम  की  सांसें   बिकी    हैं ।
तुम्हारा  यह  नया  व्यापार  है क्या ।।

इलेक्शन लड़ गए तुम  जात  कहकर ।
तुम्हारी   बात   का  आधार  है  क्या ।।

यहां  पर  जिस्म  फिर  नोचा गया है ।
यहां  भी  भेड़िया   खूंखार  है  क्या ।।

बड़ी  शिद्दत  से  मुझको  पढ़ रहे हो ।
मेरा चेहरा  कोई  अखबार  है  क्या ।।

हिजाबों   में  खरीदारों  की   रौनक ।
गली में  खुल  गया बाज़ार  है क्या ।।

बहुत  दिन  से कसीदे  लिख  रहे हैं ।
कलम  में आपके  भी धार  है  क्या ।।

कदम  उसके  जमीं  पर अब नहीं हैं ।
हुआ कुछ चांद  का  दीदार  है क्या ।।

तबस्सुम    पर    तेरे   हैरत   हुई   है।
गमों  की  हो   गई  भरमार  है क्या ।।

महज मजहब मेरा  पूछा  था  उसने ।
कहा   तू  देश  का  गद्दार   है  क्या ।।

            नवीन मणि त्रिपाठी
           मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल -मेरी आशिक़ी क्या अमानत नहीं है

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ख़यानत  की   खातिर  मुहब्बत नहीं है ।
मेरी  आशिकी क्या  अमानत  नहीं  है ।।

नज़र  से हुई  थी  ख़ता  दफ़अतन  जो ।
हमें  उस  ख़ता  से  शिकायत  नहीं है ।।

मिटा   कर   चले   जा   रहे   हैं  उमीदें ।
बची  आप  में  भी  शराफ़त   नहीं   है ।।

चले  आइये  बज़्म   में  रफ़्ता   रफ़्ता  ।
मेरी  आप  से  अब  अदावत  नहीं  है ।।

यकीं कर मेरा   रूठ   कर   जाने  वाले।
मेरे दिल की अब तक इजाज़त नहीं है।।

तेरे  दर  पे आना  मुनासिब कहाँ  अब ।
वहां  आशिकों  की  निज़ामत नहीं  है ।।

शुरूआत  है  ये   बुरे  दिन की  शायद।
दुआवों  से  अब  तो इज़ाफ़त  नहीं है ।।

गुजर जाएंगे मुफ़लिसी के ये  दिन भी ।
बुरा  वक्त  भर  है  कयामत  नहीं   है ।।

करेगा वो  इंसाफ  जुल्मो  सितम  का ।
तुम्हारी   वहां   तो   हुकूमत  नहीं  है ।।

न  उम्मीद रखिये  वफ़ा  की  यहां पर ।
यहां तो  ख़ुदा  की  अक़ीदत  नहीं  है ।।

उसे दिल न देना है कमसिन जिगर  वो ।
मुहब्बत  की  कोई हिफ़ाज़त  नहीं है ।।

जिधर   फेरते  हैं  अदा   से  वो  नज़रें ।
उधर  कोई   बस्ती   सलामत  नहीं  है।।

        ---नवीन मणि त्रिपाठी
          मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल - भूँखे हैं नौजवान कटोरा है हाथ में

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इतनी  जफ़ा  शबाब  पे  लाया  न  कीजिये ।
मुझको   मेरा  वजूद बताया  न   कीजिये ।।

भूखें   हैं   नौजवान   कटोरा   है  हाथ   में ।
थाली किसी के हक़ की हटाया न कीजिये ।।

बेटा  पढा  लिखा  के  वो  नीलाम  हो गया ।
कोटे   की  राजनीति   कराया  न  कीजिये ।।

अब न्याय क्या करेंगे कभी आप  मुल्क  से ।
झूठी तसल्लियाँ  तो  दिलाया   न  कीजिये ।।

कुर्सी  पे  जात  ढूढ  के चेहरा  दिखा  दिया ।
गन्दा  है जातिवाद  सिखाया  न  कीजिये ।।

वो जल रहाहै आजभी मण्डल की आग से ।
देकर  हवाएं   और  जलाया  न  कीजिये ।।

चेहरा बदल  बदल के  नहीं वोट  मांगना ।
अपनी हकीकतों को छुपाया न कीजिये ।।

कैसे   फरेबियों   का    यहां  राष्ट्रवाद   है ।
करते कहाँ हैं न्याय दिखाया  न्  कीजिये ।।

उनकी  गरीबियों  से  उन्हें  वास्ता ही क्या।
अब लाली पॉप दे के फँसाया न् कीजिये ।।

जीते  चुनाव  आप   सवर्णो  के  नाम  पर ।
संसद  में  इनका  दर्द बढ़ाया  न  कीजिये ।।

वादा किया है पास करेंगे वो बिल भी आप ।
कोटे  से  मुल्क  और  मिटाया  न  कीजिये ।।

          नावीन मणि त्रिपाठी
        मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल -बस रात भर की बात थी

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बस रात भर की बात थी , फिर भी रहा पहरा तेरा ।
ऐ  चाँद  तेरी  बज़्म  में  कायम  रहा  रुतबा  तेरा ।।

वो  तीरगी  जाती  रही  रोशन  लगी हर शब मुझे ।
मेरे तसव्वुर  में कभी जब  अक्स  ये  उभरा तेरा ।।

टूटा हुआ तारा था इक हँसता रहा क्यूँ  कहकशां ।
यूँ  ही  जमीं  से  देखता मैं  रह गया  लहज़ा तेरा ।।

देकर गई  है मुफ़लिसी ,कुछ  तज्रिबा भी कीमती ।
मुझको अभी तक याद है ,बख्शा हुआ सदक़ा तेरा।।

है  जिक्र  तेरे  हुस्न  का  ,बाकी  कोई  चर्चा  नहीं ।
है चार  सू  खुशबू  तेरी  छाया  रहा  जलवा  तेरा ।।

रानाइयों  के  फेर में  हम  भी  हरम  में  आ  गए ।
देखा  हया   के  वास्ते  गिरता  रहा  परदा   तेरा ।।

सारा  ज़माना हो  गया दुश्मन  मेरा इस बात  पर ।
कातिल  बनाकर  उम्र भर जारी रहा फ़तबा तेरा ।।

नज़रों की थी ग़फ़लत या फिर वह ख्वाब था मेरा कोई ।
महफ़िल  में चर्चा  है बहुत  आकर  चला .जाना तेरा ।।

मायूस    है    सारा   चमन   मायूस   दीवाने   हुए ।
जब  से  दुपट्टे  में  छिपा  है  चाँद  सा  चेहरा  तेरा ।।

खामोशियों  के बीच से उठने  लगे हैं कुछ सवाल ।
वो मिन्नतें  करता  गया पर दिल नहीं पिघला तेरा ।।

            नवीन मणि त्रिपाठी
           मौलिक अप्रकाशित 
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शनिवार, 29 जुलाई 2017

ग़ज़ल ---बाकी अभी है और फ़ज़ीहत कहाँ कहाँ

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लेंगे   हजार   बार   नसीहत   कहाँ  कहाँ ।
बाकी अभी है और  फ़जीहत कहाँ कहाँ ।।

चलना बहुत  सँभल  के ये  हिन्दोस्तान है ।
मिलती यहां सभी को हिदायत कहाँ कहाँ।।

मजहब कोई बड़ा है तो इंसानियत का है ।
पढ़ते  रहेंगे  आप  शरीअत  कहाँ  कहाँ ।।

वादा  किया  हुजूर  ने  बेशक  चुनाव  में ।
यह बात है अलग कि इनायत कहाँ कहाँ।।

बदलेंगे लोग ,सोच बदल दीजिये जनाब ।
रक्खेंगे आप इतनी  अदावत  कहाँ कहाँ ।।

ईमान   बेचता   है   यहाँ   आम   आदमी ।
करते   रहेंगे  आप   हुकूमत  कहाँ  कहाँ ।।

कैसे   रिहा  हुआ  है  यही  पूछते  हैं सब ।
होती  है पैरवी में किफ़ायत  कहाँ  कहाँ ।।

है देखना तो देखिए  मुफ़लिस की जिंदगी ।
मत देखिए हैं लोग  सलामत  कहाँ  कहाँ ।।

सहमें  हुए  हैं चोर  हकीकत  ये  जानकर ।
आएगी इक नज़र से कयामत कहाँ कहाँ ।।

हालात  देख  के वो  समझने लगे  हैं  सब ।
ये  ग़म कहाँ कहाँ  ये  मसर्रत कहाँ  कहाँ।।

चोरों  को   भी  तलाश  है  ईमानदार  की ।
ढूढा ज़मीर  में  है  सदाक़त  कहाँ  कहाँ ।।

           नवीन मणि त्रिपाठी 
         मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल - तू सलामत रहे यूँ छोड़ के जाने वाले

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मेरी   आबाद   मुहब्बत  को  मिटाने  वाले ।
तू  सलामत   रहे   यूँ  छोड़  के  जाने वाले ।।

चन्द   रातों   की  मुलाकात  न्   सोने  देगी ।
याद   आएंगे  बहुत   नींद  चुराने   वाले ।।

कितना बदलाहै जमाने का चलन देख जरा।
तोड़  जाते  हैं ये  दिल ,प्यार  निभाने वाले।।

इस तरह रूठ के जाने की जरूरत  क्या थीं।
यूँ  किताबों  में  गुलाबों  को  छिपाने  वाले ।।

चार अशआर लिखे थे जो कभी ख़त में तुझे।
क्या मिला तुझको मेरे ख़त को जलाने वाले ।।

आज निकले वो गली से तो छुपा कर चेहरा ।
मेरी   तस्वीर  को  आंखों में सजाने  वाले ।।

रुख बदलते ही हवाओं ने सितम क्या ढाया ।
खो   गए   लोग   मेरे  नाज़ उठाने  वाले ।।

प्यार  का मैं  हूँ  मुसाफिर न् मुझे रोको तुम ।
है   कई   लोग  यहां   राह  बताने    वाले ।।

जिंदगी  भीड़   में   गुजरे  ये   तमन्ना  मेरी ।
मेरी  तन्हाई   में  आते   हैं  सताने    वाले ।।

कोई सुकरात को ,शंकर तो कोई  मीरा को।
ज़हर  के  साथ  मिले  लोग  पिलाने  वाले ।।

इश्क़ बिकता है खुले आम जरूरत पे यहां ।
शह्र   में   खूब    हैं  दूकान   चलाने  वाले ।।

           नवीन मणि त्रिपाठी 
            मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल ----मर रहा आंखों का पानी देखिए

बात    उसकी    आसमानी    देखिए ।
मर  रहा  आंखों   का  पानी  देखिए ।।

फिर किसी फारुख की गद्दारी  दिखी ।
बढ़    रही    है   बदजुबानी  देखिए ।।

पत्थरों   से   बाज  वो   आते   नही ।
कायरों    की    बदगुमानी   देखिए ।।

कौन   कहता  डर  गया  है   रोमियो ।
रास्तों    पर     छेड़खानी     देखिए ।।

वह   नकाबों  की  घुटन  से  ऊबकर ।
कहती   है   कोई   कहानी    देखिए ।।

रायफल   लेकर    खड़े   भूटान   में ।
दिल   यहां    हिन्दोस्तानी    देखिए ।।

अब  पीओके   चाइना  का  हो गया ।
पाक   की   भी  मेहरबानी   देखिए ।।

 लोभियों  के  दंश  में विष  है  बहुत ।
बेटियां   घर    में    सयानी   देखिए ।।

देखना   है  जुर्म   की  तासीर   जो ।
आप   अपनी   राजधानी   देखिए ।।

लोग   इंटरनेट  में  उलझे  है   यहां ।
देश  की   ढहती   जवानी  देखिए ।।

आ  गया  है  क्या  जमाना  दोस्तों ।
 हाँकते   सब    लन्तरानी   देखिए ।।

 सिर्फ अंग्रेजी  में  करते   बात  वो ।
 कुछ गुलामी की  निशानी  देखिए ।।

          नवीन मणि त्रिपाठी
         मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल -- हमें मालूम है इल्ज़ाम तय है

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तुम्हारी बज्म में  इक  शाम  तय  है ।
फ़िजा में इश्क़  का अंजाम  तय है ।।

सफाई  से  मिलेगा  क्या हमे  अब ।
हमें   मालूम  है  इल्ज़ाम  तय   है ।।

भटकने  की जरूरत  क्या है  यारों ।        फ़ना  के बाद भी  तो धाम  तय है ।।

गरीबों   का    उड़ा  बैठे  हो  चारा ।
तुम्हारे  हक़ में कब आराम  तय है ।।

हमारी  उम्र  का   है  तज्रिबा  यह ।
शराफ़त  में  बड़ा  संग्राम  तय  है ।।

नई  कुर्सी  पे वो  बैठा  है जब  से ।
बताते  लोग  हैं  कोहराम  तय  है ।।

अगर मौला ने बख़्सी  जिंदगी यह ।
हमारे  हाथ  का  भी काम  तय है ।।

वो हाकिम की खुशामद में लगा था।
उसी का आज फिर इनअाम तय है ।।

हथेली  की  लकीरों  को  जरा  पढ ।
मेरी  किस्मत  में  तेरा  नाम  तय है ।।

निभाओगे   कहाँ  तक  साथ  मेरा ।
तुम्हारे  वक्त  का  तो  दाम  तय है ।।

           नवीन मणि त्रिपाठी 
          मौलिक अप्रकाशित

हौसला फिर कोई बड़ा रखिये

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हौसला  फिर  कोई   बड़ा  रखिये ।
खुद के  होने  की इत्तला  रखिये ।।

बन्द  मत   कीजिये  दरीचों  को ।
इन हवाओं का सिलसिला रखिये ।।

हार   जाएं   न   कोशिशें    मेरी ।
मेरे खातिर भी कुछ दुआ रखिये ।।

खो  न  जाऊं  कहीं  जमाने  में ।
हाल क्या  है  जरा  पता रखिये ।।

दुश्मनी  खूब   कीजिये  लेकिन ।
दिल से जुड़ने का रास्ता रखिये ।।

गर जमाने  के  साथ है  चलना ।
मुज़रिमों से भी वास्ता  रखिये ।।

लोग   मिलते  यहां  नकाबों  में ।
कुछ हक़ीक़त यहां छुपा रखिये ।।

जिंदगी   में   सुकूँ   ज़रूरी    है ।
आसमां सर पे मत उठा रखिये ।।

है शुकूँ  की अगर  तलास बहुत ।
हुक्मरां से  भी लस्तगा  रखिये ।।

काम   बिगड़े  अगर  बनाने  हैं ।
तो खुशामद  का पैतरा  रखिये ।।

हो इजाज़त  तो आप से कह  दूं ।
पास अपने ये  मशबरा  रखिये ।।

बिक  गया  बाप  पढाकर  बेटा ।
काम  के  नाम  घुनघुना रखिये ।।

             नवीन मणि त्रिपाठी
            मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल - कोई हसरत उफ़ान तक आई

2122 1212 22

बात दिल की  जुबान  तक आई । 
कोई हसरत  उफ़ान  तक आई ।।

मैं  नहीं  बन्द  कर  रहा  कोटा ।
यह  बहस संविधान  तक आई ।।

हौसले  फिर  जले   सवर्णो   के ।
रोशनी  आसमान  तक    आई ।।

फायदा  क्या  मिला  हुकूमत से ।
बस नसीहत लगान तक आयी ।।

मिटती  हस्ती  को  देखता हूँ  मैं ।
आंख जब भी रुझान तक आई ।।

यह  नदी इंतकाम  की  खातिर ।
आज हद के निशान तक आई ।।

हक जो मांगा है,औरतों ने कभी ।
रोज  चर्चा  कुरान  तक   आई ।।

बूंद भर  ही  सही  मगर  स्याही ।
तेरे   झूठे   गुमान   तक  आई ।।

तीर  बेशक  नही  चला लेकिन ।
एक उगली  कमान  तक  आई ।।

फंस गई जाल में वही चिड़िया ।
जो थी लम्बी उड़ान तक आई ।।

जुर्म पकड़ा गया है फिर उसका ।
खोज  ऊंचे  मचान  तक  आई ।।

खूब  बारूद  का   सिला  लेकर ।
कोई  आफ़त मकान  तक आई ।।

          नवीन मणि त्रिपाठी
         मौलिक अप्रकाशित

तेरी आँखों मे

2122  1212  1122  22

है   कोई   तिश्नगी  जरूर   तेरी  आँखों   में |
मीठे   एहसास  का  सरूर  तेरी  आँखों  में ||

जब भी देखा गया ये अक्स किसी दर्पण में ।
बे  अदब  आ  गया , गुरूर   तेरी  आँखों में ||

ख़ास मुश्किल के बाद ही तेरे दर तक पहुँचा ।
कुछ  उमीदें  दिखीं  हैं  दूर  तेरी  आँखों   में ।।

मैं तो  हाज़िर  था  तेरीे एक नज़र पर  साकी ।
बेसबब   क्यो  हुआ  फितूर  तेरी  आँखों  में ।।

जाम छलके नहीं  है आज तलकभी तुझसे ।
है   बड़ा   कीमती   शऊूर   तेरी  आँखों  में ||

मंजिलो की तलाश में ये भटकती  ख्वाहिश ।
देख   ली  जन्नतों  की  हूर   तेरी  आँखों  में ||

हार   बैठे  थे   जिंदगी  के  अंधेरों   से   हम।
मिल  गया  जिंदगी  का  नूर तेरी आँखों  में ||

हो  के  बेचैन  जब  मैं  तुझको  भुलाना चाहा |
फिर दिखा   है  मेरा   कसूर   तेरी  आँखों  में ||

                          नवीन

गुरुवार, 13 जुलाई 2017

ग़ज़ल - जिसने कभी वफ़ा से किनारा नही किया

*221  2121 1221  212*

किस्मत ने उसके साथ करिश्मा नही किया । 
जिसने कभी वफ़ा से  किनारा नहीं  किया ।।

रहना  पड़ा  उसी  के  हरम  में तमाम उम्र ।
जिसने  हमारा  साथ  गवारा  नहीं  किया ।।

कितनी मिली जफ़ा है  मुहब्बत के वास्ते ।
तुमने  कभी  हिसाब पे चर्चा नहीं किया ।।

कानून पास  हो चुके  मुद्दों  के  नाम पर ।
किसने कहा करों में इजाफा नहीं किया ।।

लुटती  है  आबरू  जो  सरेआम  शह्र में ।
कहते हैं लोग हुस्न पे परदा  नहीं  किया ।।

शायद कोई ख़ता हुई जबसे नज़र मिली।
उसने  इधर निगाह  दुबारा  नहीं  किया ।।

इफ़्लास का हमारे जब उसको पता चला ।
तब  से  वो  ऐतबार  हमारा  नहीं  किया ।।

कुछ  तो  सहा  है  दर्द  जरा मानिए हुजूर ।
शब भर दुआ के साथ गुजारा नहीं किया ।।

कितना  बदल  गया है यहां आम आदमी ।
इज्ज़त  गई  तो  शोर शराबा नहीं किया ।।

         --नवीन मणि त्रिपाठी
         मौलिक अप्रकाशित 
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ग़ज़ल -- दर्द गहरा था

2122 1122 1122 22(112)
दर्द गहरा  था मगर  हद  से  गुज़रने  न  दिया ।
अश्क़ हमने भी कभी आंख  में आने  न दिया ।।

आसमा   में  वो  परिंदे  ही  सफ़र  करते  हैं ।
जिन परिंदों ने कभी पर को कतरने न दिया ।।

आज खामोश हैं घुघरू जो खनकते थे कभी ।
वक्त  बेचैन  से  पावों  को  थिरकने  न दिया ।।

ख्वाहिशें  खूब  जवाँ  थी   किसी  मैखाने  में ।
मेरे   मौला  ने   मुझे  रात  बहकने  न   दिया ।।

मैंने  तूफान   में   चेहरे   पे   सिकन  देखा  है ।
उन  हवाओं  ने  कभी  जुल्फ सँवरने न दिया ।।

उंगलिया  लोग  उठाते  हैं  उसी  पर  अक्सर ।
जिंदगी भर जो कदम घर से बहकने न दिया ।।

यह  हक़ीक़त   है  खरीदार  बहुत  थे   उनके ।
यूँ  तिज़ारत में  कभी भाव को गिरने न दिया ।।

जीत  सकते  थे  मुहब्बत की ये बाजी शायद ।
एक  सिक्का  भी मेरे नाम  उछलने न  दिया ।।

क़द्र क्या है ये हिफ़ाज़त के उसूलों से मिला ।
मेरे  साकी  ने  कहीं जाम छलकने न  दिया ।।

            ----नवीन मणि त्रिपाठी 
             मौलिक अप्रकाशित 
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ग़ज़ल - हमारे इश्क़ की तहरीर

1222 1222 1222 1222
हमारे  इश्क की  तहरीर  गर मंजूर  हो  जाये ।

हमारे जख्म का  हर दर्द भी काफूर हो जाये ।।


दुपट्टे को हवा में यूं उड़ाकर क्या मिला तुझको ।

मुझे डर है  न दीवाना  कहीं  मशहूर  हो जाये ।।


अना के साथ उसके हुस्न की होती नुमाइश है ।

कहीं ऐसा न्  हो  तारीफ से  मगरूर हो जाये ।।


मुहब्बत रोज जिंदाबाद हो अहले चमन में अब ।

तुम्हारे शहर का भी  कुछ  नया दस्तूर हो जाये ।।


मुकम्मल हो तबस्सुम का नज़ारा इन फिजाओं में ।

कोई  सूखा  हुआ चेहरा भी अब अंगूर  हो  जाये ।।


तुम्हारी इस तरक्की से बहुत  डरने  लगा  है वो ।

 न हक से  बेदखल  कोई  यहां  मजदूर हो जाए ।।

बुधवार, 12 जुलाई 2017

ग़ज़ल - मौत के जश्न पे सम्वाद करेगी दुनिया

*2122  1122  1122  22*
इस   तरह   अम्न  को   बर्बाद   करेगी   दुनिया ।
फिर   नए   जुर्म   को   ईजाद  करेगी  दुनिया ।।

छीन   लेती   है  निवाले   भी   मेरे   बच्चों  से ।

कब  तलक  कर्ज  से आज़ाद  करेगी  दुनियां ।।

जब भी मकसद का शजर बनके नज़र आऊंगा।

मेरी   ताक़ीद   पे    फरियाद   करेगी  दुनिया ।।

रोज   उठता   है  धुंआ   एक  कहानी  लेकर ।

क्या  बताऊँ  की  किसे  याद करेगी  दुनिया ।।

है  सराफ़त से  तेरी  बज्म  में जीना मुश्किल ।

साफ  दामन  पे  बहुत  शाद  करेगी दुनिया ।।

कत्ल  करने  का सलीका भी अजब है यारों ।

हर  सही  बात  पे  अपवाद  करेगी  दुनिया ।।

मुफ़लिसी देख  के अपने भी  मुकर जाते  हैं ।

कौन  कहता  है कि  इमदाद करेगी  दुनिया ।।

जख्म देकर के वो मरहम की खबर रखती है ।

लूटकर  घर  मेरा   आबाद   करेगी   दुनिया ।।

नव  निहालों  की  हथेली  में  है बारूद बहुत ।

अब  तो मासूम  को जल्लाद  करेगी दुनिया ।।

रोज  ऐटम  की  नयी   खेप   बना  देती   है  ।

मौत  के जश्न   पे  सम्वाद   करेगी   दुनिया ।।

          नवीन मणि त्रिपाठी 

        मौलिक अप्रकाशित 
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ग़ज़ल - हाकिमों से मशबरा हो जाएगा

2122 2122 212 

वह   हमारा   आइना   हो   जाएगा ।
सच कहूँ दिल का खुदा हो जाएगा ।।

हैं   विचाराधीन  सारे   जुर्म   क्यों ।
फिर इलेक्शन में खड़ा हो जाएगा ।।

फैसले  होंगे उसी के हक़  में अब ।
हाकिमों से  मशबरा  हो  जाएगा ।।

इस सियासत में कोई जल्लाद भी ।
जिंदगी  का  रहनुमा  हो  जाएगा ।।

देखना  तुम  भी  इसी  बाजार  में ।
सच भी कोई मकबरा हो जाएगा ।।

फिर कहर ढाने लगा है वह शबाब ।
हुस्न पर  कोई  फ़ना  हो  जाएगा ।।

शरबती आंखों की हरकत देख कर ।
यह मुसाफ़िर गमज़दा हो जाएगा ।।

रिंद  चर्चा   कर   रहे   हैं  आपकी ।
आपका  घर  मैकदा  हो  जाएगा ।।

चन्द  लम्हा  ही  सही पर एक दिन ।
तू   हमारा   हौसला  हो   जाएगा ।।

बेवफा  पर  कर लिया मैंने यकीन ।
क्या खबर थी बावफ़ा हो जाएगा ।।

            नवीन मणि त्रिपाठी 
            मौलिक अप्रकाशित 
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ग़ज़ल - तुम्हारे हुस्न का सानी नहीं है

1222 1222 122

हुई  तारीफ   गुस्ताखी   नहीं   है ।
तुम्हारे  हुस्न  का  सानी नहीं  है ।।

चली आओ  हमारी  बज्म में भी ।
हमारी  बज्म  अनजानी नहीं  है ।।

तेरी यादों से ये  शम्मा  है  रोशन ।
मेरी  चाहत  अभी  हारी नहीं  है ।।

मुकद्दर  आजमाइस  कर रहा हूँ ।
मेरा फ़तबा  कोई  जारी नहीं  है ।।

हमारी  इल्तज़ा है  लौट  आओ ।
हमारे   पास   मक्कारी  नहीं  है ।।

बहुत नाराज़ हो यह जानकर भी ।
सिवा  तेरे   कोई  यारी  नहीं  है ।।

ग़ज़ल की रूह से वाकिफ नहीं जो ।
ग़ज़ल उनसे लिखी जाती नहीं है ।।

मुहब्बत बन गई तासीर  जिसकी ।
फ़ना  वो   शायरी  होती  नहीं  है ।।

कभी बेदर्द मत समझा करो  तुम ।
खुदा  की  बेरुखी  भाती  नहीं  है ।।

मेरी आवारगी  का  फिक्र  उसको ।
उसे भी  नींद  अब आती  नहीं  है ।।

फलक में चाँद का चेहरा हो जब भी ।
पलक तक आंख झपकाती नहीं हैं ।।

अजब है हाल इस दीवानगी का ।
हमारी  तिश्नगी  जाती  नहीं  है ।।

          नवीन मणि त्रिपाठी 
         मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल - तेरी आंखों में

2122  1212  1122  22

है   कोई   तिश्नगी  जरूर   तेरी  आँखों   में |
मीठे   एहसास  का  सरूर  तेरी  आँखों  में ||

जब भी देखा गया ये अक्स किसी दर्पण में ।
बे  अदब  आ  गया , गुरूर   तेरी  आँखों में ||

ख़ास मुश्किल के बाद ही तेरे दर तक पहुँचा ।
कुछ  उमीदें  दिखीं  हैं  दूर  तेरी  आँखों   में ।।

मैं तो  हाज़िर  था  तेरीे एक नज़र पर  साकी ।
बेसबब   क्यो  हुआ  फितूर  तेरी  आँखों  में ।।

जाम छलके नहीं  है आज तलकभी तुझसे ।
है   बड़ा   कीमती   शऊूर   तेरी  आँखों  में ||

मंजिलो की तलाश में ये भटकती  ख्वाहिश ।
देख   ली  जन्नतों  की  हूर   तेरी  आँखों  में ||

हार   बैठे  थे   जिंदगी  के  अंधेरों   से   हम।
मिल  गया  जिंदगी  का  नूर तेरी आँखों  में ||

हो  के  बेचैन  जब  मैं  तुझको  भुलाना चाहा |
फिर दिखा   है  मेरा   कसूर   तेरी  आँखों  में ||

                          नवीन

सोमवार, 26 जून 2017

ग़ज़ल --तेरी महफ़िल में दीवाने रहेंगे

1222 1222 122

शमा    के   पास    परवाने   रहेंगे ।
तेरी  महफ़िल  में   दीवाने   रहेंगे ।।

तुम्हारी शोखियाँ कातिल हुई हैं ।
तुम्हारे    खूब   अफ़साने   रहेंगे ।।

बना देंगे नया इक ताज़ हम भी ।
हमें  जब  हाथ  कटवाने  रहेंगे ।।

तुम्हारी   बज्म  में  आता  रहूँगा ।
खुले जब  तक  ये  मैखाने  रहेंगे ।।

जिसे है फिक्र दौलत की नहीं अब ।
उसी    के   साथ  याराने  रहेंगे ।।


तुम्हारी शोखियाँ कातिल हुई हैं ।
तुम्हारे  खूब  अफ़साने रहेंगे ।।

बड़ा  इल्जाम  फिर लगने लगा है ।
हजारों    जख्म   पहचाने   रहेंगे ।।

 हवाओं में गजब खुशबू है उसकी ।
कहाँ  तक  लोग  अनजाने  रहेंगे ।।

चुरा लेते हैं अक्सर लोग दिल को ।
अभी  पहरे  पे  कुछ थाने  रहेंगे ।।

हमें  है  याद उसका हर तरन्नुम ।
हमारे   साथ   नज़राने   रहेंगे ।।

न् जाओ इस तरह से छोड़ कर अब ।
कई   कूचे   तो   वीराने    रहेंगे ।।

छलकती मय का जादू जब तलक है।
नज़र  के   पास   मस्ताने   रहेंगे ।।
             ---- नवीन मणि त्रिपाठी
                 मौलिक अप्रकाशित
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ग़ज़ल

*221 2121  1221  212*

कैसे  कहूँ  मैं  आपसे   मुझको  गिला  नहीं ।
चेहरे  से  क्यूँ नकाब अभी तक उठा नहीं ।।

भूखा किसान शाख  से लटका हुआ  मिला ।
शायद  था  उसके  पास  कोई  रास्ता नहीं ।।

नेता  को चुन  रहे  हैं  वही  जात  पाँत  पर ।
जिसने कहा था जात मेरा  फ़लसफ़ा नहीं ।।

मजबूरियों  के  नाम  पे  बिकता  है आदमी ।
तेरे   दयार   में   तो   कोई   रहनुमा   नहीं ।।

मुझसे   मेरा  ज़मीर   नहीं   माँगिये   हुजूर ।
इसकी ही वज़ह से मैं अभी तक मरा नहीं ।।

हालात  आजमा  के  गए  मुझको  बार बार ।
रहमत खुदा की थी कि नज़र से गिरा नहीं।।

उठती  हैं   बेटियां  भी  यहां  रोज  कार  से ।
मत  बोलिये  कि  बाप  यहां गमज़दा नहीं ।।

उलझा दिया चमन है ये मजहब के नाम पर ।
रोटी   से  हुक्मरां   का  कोई  वास्ता  नहीं ।।

चेहरे को  देखकर  वो मुकरते हैं इस  तरह ।
जैसे  हो  उनके  पास  कोई  आईना  नहीं ।।

कोटे  से  कर रहे  हैं सियासत  वो  देश  में ।
पैनी  सी ज़ेहन पर  है  कोई  तबसरा नहीं ।।

            -- नवीन मणि त्रिपाठी

ग़ज़ल -- तेरे चमन में देखा तन्हाइयों की चर्चा

*221  2122  221 2122*
तेरे चमन में  देखा  तन्हाइयों की चर्चा ।
कुछ  लोग कर रहे हैं दुष्वारियों की चर्चा  ।।

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चेहरा छुपा छुपा के वह रोज मिल रही है ।
होने लगी है उसकी लाचारियों की चर्चा ।।
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चुपचाप वो खड़े हैं देखा कभी था जिनको ।
मशहूर कर गई थी बेबाकियों की चर्चा ।।
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चलती रही वो अक्सर बनकर के रूह मेरी ।
क्यो आज हो रही है परछाइयों की चर्चा ।।

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मुँह फेर कर गई हैं खुशियां भी मेरे दर से ।
जब से हुई हमारी बीमारियों की चर्चा ।।

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नज़रों से सब बयाँ है चेहरा खिला खिला है ।
सुनकर गई है वह भी शहनाइयों की चर्चा ।।

--------------------------–-------------
यूँ ही ग़ज़ल हुई थी मालूम था कहाँ ये ।
पैनी नज़र से होगी बारीकियों की चर्चा ।।

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शायद वो शहर भर में बदनाम हो चुका है ।
सबकी जुबां से सुनता रुसवाइयों की चर्चा ।।

              नवीन मणि त्रिपाठी

ग़ज़ल--झुकी झुकी सी नज़र में देखा

-----**** ग़ज़ल ***------

121  22  121 22 121 22 121 22
       
झुकी   झुकी  सी  नज़र  में   देखा ,
कोई   फ़साना   लिखा   हुआ   है ।।
ये    सुर्ख   चेहरा    बता   रहा   है 
के दिल का  मौसम  जुदा  जुदा है ।।

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फ़िजा  की   सूरत   बदल   रही   है ,
अजीब  मंजर  है  आशिकी    का ।।
हैं    मुन्तजिर    ये    सियाह   रातें ,
वो  चांद  कितना  ख़फ़ा  खफ़ा है ।।

-----------------------------------------------    

तमाम    शिकवे    गिले    हुए     हैं ,
तमाम     बातें    बयाँ    हुई      हैं ।
जो   फासले   बन   गए  थे तुझसे ,
क्यों  रफ्ता  रफ्ता   बढ़ा   रहा   है ।।
--------------------------------------------------

सबा   भी   सरसर    बनी    हुई   है ,
सुकूँ   के  लम्हों   ने   साथ   छोड़ा ।
ये    तीरगी   का   अजीब   आलम, 
चिराग   घर  का   बुझा   बुझा  है ।।

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जरूर   कुछ   तो   मलाल   होगा , 
हमारी    चाहत  के    हौसलों  से ।
ऐ   हुस्न  वाले   बता   तो   मेरा ,
गुनाह   जो  यूँ कटा   कटा   है ।।

------------------------------------------------

 जो  आग  दिल  में  लगा  गए थे , 
वो आग  अब  तक  बुझी  नहीं  है ।
सुलग रही  है  ये  दिल  की  बस्ती ,
दयार   में  अब   धुंआ   धुंआ  है ।।

 --------------------------------------------------

यहाँ   रकीबों   की   महफिलों   में , 
तेरी    अदाएं    मचल    रही     हैं ।
तेरे    उसूलों   की   सरजमीं    पर ,
वफ़ा  का  झंडा   झुका  झुका  है ।।

----------------------------------------------------

नकाब   इतना   उठा  के  मत  चल
 हैं   रिंद   मुद्दत   से    तिश्नगी   में ।
ये  जाम  छलका  न आंख  से अब
ये  मैकदा  क्यूँ   खुला   खुला  है ।।

-----------------------------------------------

न    नींद   आई    न   चैन  तुझको
न  होश  में  क्यूँ  मिले अभी  तक ।
ये   तेरा   लहजा    बता   रहा    है 
ये   इश्क  तेरा  नया    नया     है ।।

--------------------------------------------------

कोई  तो  रहबर  है  तेरे  दिल   का ,
किसी  की  नजरें  हुई   हैं  कातिल ।
जो  नूर   करता   था  बज्म  रोशन ,
वो   नूर    कैसा   लुटा    लुटा    है ।।

---------------------------------------------------

ओ    जाने   वाले   जरा  ठहर   जा 
इधर   भी  अपनी   निगाह  कर  दे ।
जो  जख्म  मुझको  मिला था तुझसे 
वो  जख्म  अब  तक  हरा  हरा  है ।।

         -- नवीन मणि त्रिपाठी 
          मौलिक अप्रकाशित 
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ग़ज़ल 50 शेर के साथ

-------ग़ज़ल -------52 शेर के साथ
2122 1212 22
बात   तुम  भी  खरी  नही करते ।
काम  कोई  सही   नही    करते ।

चोट दिल पर लगी है फिर उनके।
काम  ये  मजहबी  नहीं   करते ।।

जब से अफसर बना दिया कोटा ।
बात  अच्छी  भली  नहीं   करते ।।

दोस्तों   की   किसी  तरक्की  में ।
यूँ   मुसीबत  खड़ी  नहीं करते ।।

जिंदगी  पर  यकीन  है  जिनको ।             वो  कभी खुदकुशी  नहीं  करते ।।

कुछ  तो  खुन्नस  बनी  रही होगी ।
बेसबब     बेरुखी   नहीं   करते ।।

पेंग  गर  प्यार   की  बढ़ानी    है ।
प्यार   में   हड़बड़ी  नही  करते ।।

है मुहब्बत  का आसरा  जिनको ।
हुस्न  की  रहबरी   नहीं    करते ।।

सिर्फ मिसरे से काम क्या चलता ।
टिप्पणी कुछ  कभी  नही करते ।।

थी    गरीबी  की  दास्तां    होगी ।
काम  गन्दा  सभी  नहीं   करते ।।

हमको मालूम राज की कीमत ।
बेवफाई    कभी   नही   करते ।।

जिनको मंजिलकी फिक्रहै काफी ।
वक़्त  से   दुश्मनी  नहीं    करते ।।

है पता उन्को  कैफियत अपनी ।
वो   इधर  तर्जनी  नहीं  करते ।।

ये  मुहब्बत  है खेल  मत मुझसे ।
हम  कभी  दिल्लगी नहीं करते ।

रहनुमाई   चली   गई   जब  से ।
बात  तब से  बड़ी  नहीं  करते ।।

वोट  पाकर  वो खो गया वरना ।
लोग  बे  इज्जती नहीं  करते ।।

है मुहब्बत  का आसरा  जिनको ।
हुस्न   की  रहबरी  नहीं   करते ।।

चोट दिल पर लगी है फिर उनके ।
काम  ये  मजहबी  नहीं   करते ।।

पेंग  गर  प्यार   की  बढ़ानी   है ।
प्यार  में  हड़बड़ी   नही    करते ।।

सिर्फ मिसरे से काम  क्या चलता ।
टिप्पणी  कुछ  नई   नही  करते ।।

वो  निशाने  पे   तीर  था   वरना ।
वो  कभी  खलबली  नहीं  करते ।।

बैठ  जाये  कोई  मेरे   सर    पर ।
छूट   इतनी  खुली  नहीं   करते ।।

सर  फ़रोसी  की  है  तमन्ना  अब ।
वार  में  बुजदिली   नहीँ    करते ।।

कीमतें    वे    वसूलते   हैं   जो।
माल  अपना  दही  नहीं   करते ।।

शर्त  है  जिस्म  दिल लगाने  की ।
लोग  क्या ज्यादती  नहीं  करते ।।

गर   किसानों  से  वास्ता  रखते ।
मुल्क  में  भुखमरी  नहीँ  करते ।।

कुछ  तबीयत मचल  गयी  होगी ।
हम  कभी  आशिकी नही  करते ।।

मुफ़्लिशी दौर से जो है वाकिफ़ ।
वो   हमारी  हसी   नहीँ   करते ।।

फंस न्  जाएं  ये पाँव  ही अपने ।
हम  जमीं  दलदली  नहीं  करते ।।

खास शातिर हैं इश्क के मुजरिम ।
हाथ  में  हथकड़ी  नहीं   करते ।।

है  छुपाना अगर  ये धन  काला ।
बिस्तरे  मखमली  नहीं  करते ।।

खर्च का बोझ बढ़ गया जब से ।
बात अब रस भरी नही  करते ।।

सर्जिकल  हो गई वहां  जब  से ।
मूछ   अपनी  तनी  नहीं  करते ।।

ध्यान  देतीं  नहीं  अगर   मैडम ।
आज  हम  शायरी  नहीं  करते ।।

मैं तो ठहरा हूँ इस तरह दिल मे ।
आप अब हाजिरी  नहीं  करते ।।

देश   द्रोही   है  कन्हैया  उनका ।
दुश्मनों   की  कमी  नहीं  करते ।।

फिर हुए हैं  जवान  क्यो जख्मी।
लोग क्या  मुखबिरी नहीं  करते ?

नेकियाँ    बेहिसाब   हैं  उनकी ।
हम  कभी  भी बदी  नहीं करते ।।

क्यों  उमीदें  लगा  के  बैठे  हो ।
अब्र   ये  चांदनी   नहीं   करते ।।

जब  से  लूटा  है लाल  कुर्ते ने ।
रेलवे   में   कुली   नहीं  करते ।।

बाम   पंथी  बिके   हुए  शायद ।
जुर्म  पर  सनसनी  नहीं  करते ।।

जब भी  मारा है  उसने आतंकी ।
क्यों वे जाहिर खुशी नहीं करते ।।

मैं भी  आज़ाद हो  गया होता ।
तेरे  शिकवे   बरी  नहीं करते ।।

जब से दौलत का  हाल जाना है ।
आँख  वो  शरबती  नहीं  करते ।।

कोई राधा नहीं दिखे तब तक ।
होठ  पर  बाँसुरी  नहीं  करते ।।

काफ़िया वो   बना  रहे   काफी ।
ध्यान   हर्फे   रवी   नहीं   करते ।।

गर कलम जारही है मंजिल तक ।
रोक कर  मन  दुखी नहीं करते ।।

काम   ऐसा   बचा   नहीं   कोई ।
अब जिसे आदमी  नहीं  करते ।।

मिल गया जब से है उन्हें वोहदा ।
बात  भी  लाजिमी  नहीं  करते ।।

शुद्ध  पण्डित का है लहू  रग   में ।
काम  मे  जाहिली  नहीं  करते ।।

हो   गई    हाफ    सेंचुरी   शायद।
बात  हम   बेतुकी   नहीं    करते ।।

            - नवीन मणि त्रिपाठी 
            मौलिक अप्रकाशित 
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