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जी हाँ मैं आयुध निर्माणी कानपुर रक्षा मंत्रालय में तकनीकी सेवार्थ कार्यरत हूँ| मूल रूप से मैं ग्राम पैकोलिया थाना, जनपद बस्ती उत्तर प्रदेश का निवासी हूँ| मेरी पूजनीया माता जी श्रीमती शारदा त्रिपाठी और पूजनीय पिता जी श्री वेद मणि त्रिपाठी सरकारी प्रतिष्ठान में कार्यरत हैं| उनका पूर्ण स्नेह व आशीर्वाद मुझे प्राप्त है|मेरे परिवार में साहित्य सृजन का कार्य पीढ़ियों से होता आ रहा है| बाबा जी स्वर्गीय श्री रामदास त्रिपाठी छंद, दोहा, कवित्त के श्रेष्ठ रचनाकार रहे हैं| ९० वर्ष की अवस्था में भी उन्होंने कई परिष्कृत रचनाएँ समाज को प्रदान की हैं| चाचा जी श्री योगेन्द्र मणि त्रिपाठी एक ख्यातिप्राप्त रचनाकार हैं| उनके छंद गीत मुक्तक व लेख में भावनाओं की अद्भुद अंतरंगता का बोध होता है| पिता जी भी एक शिक्षक होने के साथ साथ चर्चित रचनाकार हैं| माता जी को भी एक कवित्री के रूप में देखता आ रहा हूँ| पूरा परिवार हिन्दी साहित्य से जुड़ा हुआ है|इसी परिवार का एक छोटा सा पौधा हूँ| व्यंग, मुक्तक, छंद, गीत-ग़ज़ल व कहानियां लिखता हूँ| कुछ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होता रहता हूँ| कवि सम्मेलन के अतिरिक्त काव्य व सहित्यिक मंचों पर अपने जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों को आप तक पहँचाने का प्रयास करता रहा हूँ| आपके स्नेह, प्यार का प्रबल आकांक्षी हूँ| विश्वास है आपका प्यार मुझे अवश्य मिलेगा| -नवीन

सोमवार, 20 नवंबर 2017

एकात्म मानववाद और धर्म


          " एकात्म मानववाद और धर्म "
                         --नवीन मणि त्रिपाठी 
           पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का कहना था कि भारत एक ऐसा देश है जो विश्वपटल पर अपनी सर्वश्रेष्ठ पहचान बनाने में पूर्ण सक्षम है । उनके द्वारा एकात्म मानववाद का विचार आज भी पूर्ण सामयिक है । पंडित जी के अनुसार किसी भी मनुष्य का शरीर मन बुद्धि और आत्मा यदि ये चारों अंग विकार रहित रहेंगे तभी सच्चे सुख की प्राप्ति हो सकती है । मनुष्य जब कोई काँटा चुभता है तो मन को कष्ट होता है अतः बुद्धि हाथ को सन्देश देती है फिर हाथ कांटा को निकलता है । मुख्य रूप से मनुष्य , शरीर, मन ,बुद्धि और आत्मा इन चारों को नियंत्रित करते हुए चारो के प्रति चिंतनशील रहता है ।यदि ये चारों ठीक होंगे तभी मनुष्य का सुखी रहना सम्भव हो पाता है । यह मानव की प्रकृति है । इसी प्रकृति को पण्डित जी ने एकात्म मानव वाद के रूप में समझा । उन्होंने भारतीय संस्कृति धर्म आदि को राष्ट्र के अंग के रूप में स्वीकार किया ।  धर्म और संस्कृति में कोई विकृति होगी तो राष्ट्र भी स्वस्थ नहीं रह सकता । अर्थात धर्म को राष्ट्र से अलग करके स्वस्थ राष्ट्र की कल्पना करना उचित नहीं होगा । उनका मानना था कि भारत की आत्मा को समझना है तो उसे राजनीति अथवा अर्थ-नीति के चश्मे से न देखकर सांस्कृतिक दृष्टिकोण से ही देखना होगा. भारतीयता की अभिव्यक्ति राजनीति के द्वारा न होकर उसकी संस्कृति के द्वारा ही होगी। पण्डित जी का एकात्म मानव वाद का यह दर्शन पूर्ण वैज्ञानिकता को सजोये हुए है । यह सिद्धांत मार्क्स वाद लेनिन वाद साम्यवाद आदि से कहीं अधिक वैज्ञानिक आधार से युक्त एवम तर्क संगत है । आज देश की वर्तमान सरकार भी उनके बताए गए सिद्धांत का अनुसरण करती हुई प्रतीत होती है । अतः जनता की असन्तुष्टि पर काफी हद तक नियंत्रण देखा जा रहा है ।
     देश  मे वामपंथी विचारधाराओं ने धर्म को राष्ट्रीय विकास का अंग स्वीकार ही नही किया बल्कि धर्म निरपेक्षता पर ही जोर देतीं रहीं । धर्म निरपेक्ष होना राष्ट्र का गौरव माना जाने लगा जबकि पण्डित जी धर्म सापेक्ष राष्ट्र की परिकल्पना करके धर्म को जिस रूप में परिभाषित किया है वह आज एक राष्ट्र की प्रगति के लिए अमूल्य चिंतन के रूप में पहचाना जा रहा है । आज हम इस आलेख में धर्म की सूक्ष्मतम विवेचना की ओर आपको ले चल रहे हैं । सम्पूर्ण विवेचना 24 अप्रैल 1965 को पंडित जी के द्वारा दिये गए उस भाषण के अंश पर आधारित है जिसमे पंडित जी ने धर्म राज्य की व्यख्या की है । आइये हम इसे समझने के लिए भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के उस क्षण से आपको जोड़ते है जब भारतीय लोक तन्त्र की स्थापना हुई ।
            देश आज़ाद होने के बाद एक ऐसे चौराहे पर खड़ा था जहां देश के अस्तित्व और प्रगति हेतु एक ऐसे मार्ग की तलाश थी जहाँ से देश उन्नति की नावगाथा लिख सके । देश के सामने दो विवादित मार्ग थे पहला मार्ग पूँजी वाद था और दूसरा मार्ग था समाज वाद । मजे की बात यह थी कि यह दोनों मार्ग खोजने वाले विद्वान विदेशी यूरोपियन थे । उनकी जो भी खोज थी वह उनकी परस्थिति और काल पर निर्भर थी । विदेशी संस्कृति से उतपन्न सिद्धांत भारत पर भी खरा उतरे यह आवश्यक नही था ।ऐसी स्थिति में पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी स्पष्ट किया कि ऐसी कोई मजबूरी तो नही है कि हम विदेशी विचारधारा को मानने के लिए विवश हों । जब इन विचारधाराओं की बहस में कोई भारतीय तक शामिल नहीं है और न् ही वे विचारधाराएं भारतीय परिवेश में विकसित हुई हैं तो इन्हें देश पर क्यों थोपा जाए । पंडित जी का मानना था कि हमें अपने देश और दुनियां की जरूरत के हिसाब से अपने विचारों को विकसित करना चाहिए । किसी के विचारों के नकल से देश को सही दिशा नही मिल सकती है ।
एकात्म मानववाद जिसे अब एकात्म मानवदर्शन के रूप में मान लिया गया है । एक ऐसी विचार धारा जिसमे मानव कल्याण की वैज्ञानिक दृष्टि समाहित है । पं0 दीन दयाल उपाध्याय  जिस एकात्म मानववाद की बात करते हैं वह एकात्म मानववाद निश्चय ही राष्ट्र को जोड़कर रखने में अत्यंत सहायक है । मैं ही जीतूंगा , मैं ही सबसे बड़ा हूँ , सब मेरे लिए ही हैं , यह भावनाएं अहंकार को जन्म देती हैं । बस यहीं से पूँजी वाद का जन्म होता है और यहीं से समाजवाद का भी जन्म होता है ।
        वर्तमान समाजवाद अपने मूल स्वरूप से बिल्कुल अलग है । यह एक व्यक्तिवादी व्यवस्था ही है । समाजवाद कहता है कि मशीन रखने वाला किसी व्यक्ति मजदूर रखता है मजदूर को कुछ धन राशि वेतन के रूप में देता है शेष मुनाफे की अधिकांस धनराशि को स्वयं रख लेता है । ऐसा कहकर यह समाजवाद मजदूर ईर्ष्या जगाता है और कहता है कि तेरे ही सहारे ये मशीन वाले लोग कार से चलते हैं । मेहनत मजदूर करता है परंतु अकेला होने की वजह से वह कमजोर है । अगर सभी मजदूर मिल जाएं तो अपना हक प्राप्त कर लेंगे । समाजवाद की यह सोच मात्र ईर्ष्या और संघर्ष की भावना को ही पोषित करती हैं ।
     साम्यवाद का दर्शन भी भारतीय संस्कृति से बिल्कुल मेल नही खाता साम्य वाद में मजदूरों की सत्ता होती है समाज की सत्ता ही नही होती है । जब मजदूर मिलकर एक साथ दिखता है तब भी वह मजदूर के रूप में कुछ नही कर पाता है तो फिर उससे कहा जाता है कि तुम अपनी सारी शक्ति हमे दो इस प्रकार मजदूर की स्वतंत्रता भी चली जाती है । अतः यहां भी यह व्यवस्था एक समूह के द्वारा तानाशाही का शिकार हो जाती है । साम्यवाद समाज की वास्तविक भावना का प्रतिनिधित्व करने में कामयाब नही हो पाता । पूर्णतया व्यक्तिवादी विचारधारा है अंततः व्यक्ति की स्वतंत्रता भी चली जाती है ।संघर्ष इसमें केंद्र बिंदु की तरह ही है ।
         पूँजी वादी विचारधारा भी एक प्रकार से संघर्ष पर ही आधारित है । प्रतियोगिता इसका मुख्य आधार है सबल ही जीवित रहे इस सिद्धांत को पूंजीवाद संरक्षित करता है ,जबकि साम्यवादी प्रतियोगिता में नहीं बल्कि वर्ग संघर्ष में विश्वास रखते हैं । यहां भी वर्ग की प्रतियोगिता हो जाती है । अतः स्पष्ट होता है कि पश्चिम में पूर्णता पर विचार ही नही किया जाता है । सारा चिंतन ही टुकड़ो टुकड़ों में है । हमारी संस्कृति अपूर्णता को स्वीकार ही नही करती ।
            पूँजी वाद का वास्तविक चेहरा व्यक्तिवाद के रूप में पहचाना जाता है । यूरोप में जो लोग व्यक्तिवाद के विरोधी थे उन्होंने व्यक्तिवाद को पूँजी वाद कहा । पूंजीवाद की वैचारिक मान्यता यह है कि मनुष्य तो मात्र एक व्यक्ति हो होता है । यह विचारधारा तो समाज के अस्तित्व को ही नहीं स्वीकार करती है । व्यक्ति की आज़ादी को ही मानव  सुख का    आधार मानती है । बाद में जब देखा गया कि आज़ाद व्यक्तियों ने अन्य कमजोर व्यक्तियों का शोषण प्रारम्भ कर दिया तो समाज वर्गों में विभाजित होने लगा । इसी बीच एक और महान विचारक कार्ल मार्क्स  ने अपना मत प्रस्तुत किया कि मानव व्यक्ति नहीं बल्कि एक समाज है ।सामाजिक समता हेतु मनुष्य की स्वंत्रता पर अंकुश आवश्यक है । मानव केवल व्यक्ति है समाज नही और मानव केवल समाज है व्यक्ति नही इस तथ्य को लेकर यूरोप के विद्वान विचारकों में काफी वाद विवाद चलता रहा । यहीं से व्यक्ति वाद और समाज वाद नामक दो विचार धाराओं का विकास हुआ । ये दोनों विचार पूर्णतया भौतिक वादी ही हैं और दोनों विचार आध्यात्मिकता का निषेध करते हैं । पंडित दीन दयाल जी का मानना था कि मानव केवल भौतिक वादी नही हो सकता बल्कि मानव की आध्ययमिक आवश्यकताएं भी होती हैं अतः जब तक भौतिकता के साथ आध्यात्मिक विकास नहीं होगा तब तक मानवता का विकास सम्भव नही । पाश्चात्य विचारधाराएं मानव को व्यक्ति और समाज मे बाटने वाली होती हैं अतः इन्हें महत्व देना उचित नही होगा ।
    पंडित जी कभी भी पाश्चात्य जगत के द्वारा निर्मित  सिद्धांतो के अंधानुकरण के पक्षधर  नहीं रहे । उनका मानना था कि प्रत्येक राष्ट्र की अपनी  प्राकृतिक व भौगोलिक स्थिति होती है  साथ ही सांस्कृतिक परिवेश में भी भिन्नताऐं  पाई जाती हैं ।अतः जो सिद्धांत पश्चिमी देशों के द्वारा निर्मित किये गए वे सिद्धांत भारत के लिए भी उपयुक्त होंगे यह कदापि सम्भव नहीं है । बहुत से लोग स्वतन्त्रता को ही निरंकुशता मान लेते हैं । पश्चिमी सभ्यता से उपजा विचार है ,कि "समाज प्रकृति सृष्टि सब चीजें मेरे लिए हैं ," अर्थात व्यक्ति के लिए हैं । प्रकृति पर विजय प्राप्त करना उद्देश्य है ।मनुष्य के अतिरिक्त  सभी जीवों को मार कर खाने की प्रवृत्ति इस लिए बढ़ जाती है क्यों कि उनके विचार में यह सब उनके (व्यक्ति)लिए हैं । मैं ही बड़ा हूँ इसलिये सारी चीजें मेरे लिए । यह पश्चिमी संस्कृति की सोच भारतीय सभ्यता के सर्वथा विपरीत है । भारतीय सोच कहती है कि संसार मे जो अन्य बस्तुएं दिखती हैं  उनमें निश्चय ही मनुष्य बड़ा है परन्तु हमारी संस्कृति कहती है जो सबके लिए और सबकी सेवा करे वही बड़ा कहलाने का हक़ रखता है । पाश्चात्य सभ्यता प्रकृति पर विजय की बात करती है । एवरेस्ट पर चढ़ जाने को एवरेस्ट पर विजय समझा जाता है ।जब भारतीय सोच का व्यक्ति हिमालय पर जाता है तो उसके भाव मे वह हिमालय एक तपोभूमि का स्थान पाता है ।
यदि संसार मे देखा जाए तो मात्र समर्थ ही नही जीवित रहता बल्कि कमजोर व्यक्ति भी जीवित रहता है । एक ऐसा समाज जहां कमजोर व्यक्ति की भी रक्षा हो सके वह समाज एक सभ्य समाज की परिधि में आता ही है ।राज्य की स्थापना का उद्देश्य ही यही है कि दुर्बल व्यक्ति के हितों रक्षा हो सके ।
     समर्थ के द्वारा कहीं दुर्बल को समाप्त न् कर दिया जाए इसलिए हम नियम और समाज को स्थापित करते हैं । अतः जीवन के समाज का आधार संघर्ष नही बल्कि सहयोग ही है । प्रकृति भी सहयोग के आधार पर ही चलती है । हम पौधों को कबर्न डाई आक्साइड देते है तो पौधे हमे आक्सीजन देते हैं । अतः वनस्पति और  मनुष्य सदैव एक दुसरे के पूरक ही हैं । जहाँ पूरकता पैदा नहीं होती वहां आसुरी भाव होता है । सबको हटाकर मैं जीवित रहूँ यह परंपरा भेद उतपन्न करने की होती है । पश्चिमी सभ्यता में द्वैत का भाव सदैव विद्यमान रहता है । अब बाइबिल को ही देखिए । यहां भी भगवान और शैतान की कल्पना है और द्वैत विद्यमान है । इसी प्रकार डार्विन और मार्क्स की कल्पनाएं भी हैं । हमारी सभ्यता अद्वैत के साथ साथ अभेद्य भी है ।द्वैत में एकता उतपन्न करना लगभग असंभव सा है । विवाह में पति पत्नी दो होते हुए भी हमारे यहां एक हो जाते हैं , परंतु पश्चिम में विवाह एक समझौता मात्र है जब सम्बन्ध निभ जाए तब तक ठीक अन्यथा सम्बन्ध टूटना भी सम्भव है । जबकि हमारी मान्यताएं मात्र इसी जन्म से नही बल्कि अनंत  जन्मों से पति पत्नी को एक मानने की होती हैं ।
     पश्चिमी सभ्यता हमारी प्रकृति से मेल नही खाती ।हमने संघर्ष और दुर्गुणों को कभी आधार नहीँ माना परंतु स्पष्ट करना चाहूंगा कि हमने कभी भी अच्छाइयों की उपेक्षा भी नही की किसी भी सभ्यता में यदि कुछ हमारी प्रकृति से मेल खाया तो उसे स्वीकार भी किया ।
        हमारी संस्कृति हमारी परंपराएं मानव को एकात्म मानती हैं । एकात्म अर्थात जिसे बाटना सम्भव नहीं । ऐसी इकाई जिसे बांटा ही न् जा सके एकात्म कहलाती है।समाज और व्यक्ति काफी घनिष्ठता के साथ जुड़े हैं जिसे अलग नही किया जा सकता है । मनुष्य व्यक्ति के रूप समाज का अभिन्न अंग है  और व्यक्ति परिवार के बिना नहीं रह सकता है । परिवार अपने ग्राम शहर के बिना अधूरा अनुभव करेगा । इसी प्रकार ग्राम शहर से ऊपर देश व राष्ट्र की इकाई आती है। व्यक्ति सदैव इन्ही समुदाय का हिस्सा है । एकात्म मानव का सुख व्यक्ति व समाज मे विभाजित नही होता बल्कि एकात्म होता है ।
    यदि  हम भारतीय संस्कृति को अधिक गौर से देखें तो पाएंगे कि मानव केवल व्यक्ति या समाज के रूप में ही एकात्म नही है बल्कि वह इस संसार व प्रकृति का भी अविभाज्य अंग है । मानव यदि प्रकृति से कोई छेड़ छाड़ करेगा तो खामियाजा मानव को उठाना पड़ेगा । मनुष्य को प्रकृति के साथ सु आचरण।करना सीखना ही होगा ।
    जो लोग प्रकृति पर विजय की बात करते हैं प्रकृति का अनियंत्रित उपभोग करते हैं उन्होंने सदैव मानवता के सम्मुख संकट को आमंत्रित किया है ।भारत आध्यात्मिक तत्व को मानवता का एक अटूट हिस्सा मानता है । यह अनुभूति का क्षेत्र है । भारत उस परमात्मा के किसी एक रूप या पूजा पद्धति का अनुयायी नही है बल्कि आध्यात्मिक उत्कर्ष के विभिन्न आयामों का यहां विकास हुआ है । यही कारण रहा है कि सभी प्राणियों में एक ही आत्मा का निवास जीव दया का भाव तथा अहिंसा आदि गुणों का यहां विकास हुआ । अध्यात्मिकता निश्चय ही एकात्मकता का अभिन्न अंग है । किसी भी विचारधारा में आध्यात्मिकता की उपेक्षा खतरनाक है ।
       किसी भी मनुष्य में शरीर मन बुद्धि और आत्मा का होना आवश्यक है । यदि इसमें से कोई भी एक तत्व उपस्थित नही हो अथवा उचित सक्रियता न् हो  तो अन्य का अस्तित्व भी खतरे में आ जाता है और इसके विपरीत यदि एक खराब स्थिति को ठीक कर दिया जाए तो अन्य तत्व भी स्वतः ऊर्जावान हो जाते हैं । अर्थात मनुष्य मन बुद्धि शरीर और आत्मा का सामुच्य ही है । अर्थात यहां भी हमे मनुष्य की प्रकृति से एकात्मकता का दर्शन होता है । यहां मन बुद्धि शरीर और आत्मा सिर्फ मनुष्य में ही नहीं बल्कि समाज मे भी पाया जाता है ।ठीक इसी प्रकार हमारे यहां व्यक्ति और समाज भी एक दूसरे के पूरक ही हैं । एक को मिटाकर दूसरे का विकास सम्भव ही नहीं है । सबको साथ में लेकर चलने से ही सच्चा विकास होगा । "सबका साथ और सबका विकास " का यह नारा भी एकात्मवाद के दर्शन पर ही आधारित है । अतः व्यक्ति और समाज दोनों साथ ही रहेंगे । इन दोनों से जो चीज निकल कर आई वह है पुरुषार्थ । धर्म अर्थ काम मोक्ष के रूप में  चार पुरुषार्थ बने । ये पुरुषार्थ केवल व्यक्ति में ही नहीं वरन राष्ट्र में भी पाए जाते हैं ।
     धर्म अर्थ काम मोक्ष चारों पुरुषार्थ की कल्पना के मूल में व्यक्ति के विकास और समाज के हित का सम्पादन ही था । धर्म अर्थ और काम  एक दूसरे के पूरक और पोषक हैं मनुष्य की प्रेरणा का स्रोत तथा उसके कार्यों का माप दण्ड मानकर चलना अधूरा होगा । फिर भी अर्थ और काम की सिद्धि का साधन का महत्वपूर्ण
आधार है ।
     एकात्मक विचारधारा के अंतर्गत  पंडित जी  जिस धर्म की कल्पना करते हैं वह अद्भुद है । कई बार धर्म को मत या मजहब मानकर उसके गलत अर्थ लगाए गए । यह त्रुटि अंग्रेजी शब्द रिलीजन शब्द के अनुवाद से प्रारम्भ हुई । धर्म का वास्तविक अर्थ है  ,- वे सनातन नियम जिनके आधार पर किसी सत्ता की धारणा हो और जिनका पालन करके व्यक्ति अभ्युदय और निः श्रेयस की प्राप्ति कर सके । धर्म के मूल तत्व सनातन हैं किन्तु उनका विवरण देश काल परिस्थिति के अनुसार परिवर्तनशील भी है । इस संक्रमणशील जगत में मात्र धर्म ही है जिसमे स्थायित्व लाने की शक्ति है । धर्म को ही नियन्ता माना गया है अतः प्रभुता भी उसी में ही निहित है ।
         जैसा कि स्पष्ट है कि समाज केवल व्यक्तियों का समूह अथवा समुच्चय नहीं अपितु एक जीवंत सावयव सत्ता है । भूमि के प्रति मातृ भाव रखकर चलने वाले समाज से राष्ट्र का निर्माण होता है । प्रत्येक राष्ट्र की अपनी एक प्रकृति होती है जो ऐतिहासिक अथवा भौगोलिक कारणों का परिणाम नहीं अपितु जन्मजात है । इसे चिति कहते हैं
        
        मैकडूगल के अनुसार चिति किसी भी समूह की मूल प्रकृति होती है । वैसे भी चिति किसी समाज की वह प्रकृति है जो जन्मजात होती है चिति कभी ऐतिहासिक कारणों से नहीं बनती है । मनुष्य के व्यक्तित्व व आत्मा  व चरित्र में अंतर होता है । व्यक्ति जीवन भर में जो भी कर्म करता है या जितने संस्कार उस में होते हैं या जो भी विचार आते हैं उन सब व्यक्ति पर एक संकलित परिणाम होता है । इस संकलित परिणाम से व्यक्तित्व का निर्माण होता है , परंतु आत्मा में कोई वस्तु जुड़ती नही है । ठीक इसी प्रकार राष्ट्र की संस्कृति में ऐतिहासिक कारणों तथा वातावरण से उतपन्न स्थिति के सामूहिक परिणामों से बहुत सी बातें जुड़ भी जाती हैं ।  
     समाज के संसर्ग से समाज के प्रयत्नों से समाज के इतिहास के परिणाम स्वरूप  जिन तत्वों का वे निर्माण करते हैं और जिन्हें वे अच्छा और गौरव पूर्ण समझते हैं  वे सब संस्कृति के अंतर्गत आ जाते हैं परंतु चिति के अंतर्गत नहीं आते हैं । चिति को लेकर तो प्रत्येक समाज पैदा होता है और समाज की संस्कृति दिशा को चिति ही निर्धारित करती है । अर्थात जो बस्तु चिति के अनुकूल होती है वह संस्कृति में सम्मिलित कर ली जाती है ।
इसी चिति से धर्म का निर्माण होता है ।
      कौरवों और पांडवो में युद्ध हुआ जिसमें कौरव की पराजय और पांडव विजयी हुए । पांडवो की विजय को हमने धर्म कहा लेकिन कौरव को धर्म से नहीं जोड़ा गया ? राम रावण के युद्ध में विभीषण ने राजद्रोह किया परंतु उसके बाद भी लोग विभीषण को अच्छा कहते हैं ? जबकि विभीषण का कार्य और जयचन्द का कार्य दोनों मेल खाता है । दोनों ने भाई और राज्य का साथ छोड़ दिया । कृष्ण ने अपने मामा का ही वध किया परंतु उन्हें दोषी नही कहा गया । जबकि कंस को असुर कहा गया । इन सभी प्रश्नों का जबाब हमारे मन की प्रकृति या  चिति ही है ।  चिति वह मापदण्ड है जिससे हर वस्तु को मान्य अथवा अमान्य की कसौटी पर रखा जाता है । यही चिति ही किसी राष्ट्र की आत्मा होती है । इसी आत्मा के आधार पर राष्ट्र खड़ा होता है और इसी चिति से राष्ट्र के प्रत्येक श्रेष्ठ व्यक्ति का आचरण भी निर्धारित होता है।
    सर्वमान्य है कि राज्य का कोई न् कोई लक्ष्य होना चाहिए । प्रत्येक राज्य का अपना एक आदर्श होना आवश्यक है ।अतः सर्वोपरिता राज्य की न होकर आदर्श की होनी चाहिए । पहरेदार खजाने से बड़ा नही हो सकता । कोष की तुलना में कोष अध्यक्ष छोटा ही माना जायेगा ।राज्य राष्ट्र की रक्षा हेतु पैदा होता है । राष्ट्र का आदर्श अर्थात चिति । चिति गहन है । उसकी अभिव्यक्ति और व्यवहार के नियमों को ही उस राष्ट्र का धर्म कहते हैं । अतः यदि महत्ता देखी जाए तो धर्म ही वह सर्वाधिक महत्व पूर्ण तत्व है जिसके द्वारा एकात्म दर्शन की सहज कल्पना सम्भव है । धर्म मे ही प्राण है । धर्म गया मतलब प्राण गया । धर्म छोड़ने का सीधा अर्थ राष्ट्र से च्युत होना है । धर्म छोड़ने वाले का सबकुछ चला जाता है ।
 
  धर्म का सम्बंध केवल मंदिर मस्जिद से नही है । उपासना किसी व्यक्ति  धर्म का
   एक अंग हो सकती है किन्तु धर्म तो व्यापक है ।मन्दिर मस्जिद लोगों में धर्माचरण की शिक्षा का प्रभावी माध्यम रहे हैं । जैसे कोई विद्यार्थी रोज स्कूल जाने के बाद भी अनपढ़ रह जाता है वैसे ही रोज़ मन्दिर मस्जिद जाने वाले लोग भी धर्म न् समझ पाए तो इसमें को आश्चर्य भी नही होगा । रिलीजन को को बहुत बार लोगों के द्वारा धर्म माना गया । अंग्रेजी अनुवाद के कारण हमारी जो बहुत सी हानिया हुई है उनमें एक बड़ी हानि यह भी है ।
     हमने देखा कि जब से हम लोग रिलीजन शब्द को धर्म के पर्यायवाची शब्द के रूप में जानने लगे तब से धर्म और जीवन का अज्ञान तथा यूरोपीय जीवन का अधिकाधिक ज्ञान हमारे जीवन का विषय बन गया । फलतः रिलीजन के जितने सहचरी भाव होते हैं उन्हें उन्हें हमने धर्म पर आरोपित कर दिया । यदि यूरोप में रिलीजन के नाम पर अन्याय अत्याचार और युद्ध हुए तो हमारे यहां भी उसे धर्म के खाते में चढ़ा लिए गए । रिलीजन का अर्थ है मत पंथ मजहब यह सब एक धर्म नही है । धर्म तो व्यपक तत्व है वह जीवन के सभी पहलुओं से सम्बन्ध रखने वाला तत्व है । धर्म मे समाज की धारणा होती है ।यह धारणा करने वाली वस्तु ही धर्म है ।
         धर्म के मूलभूत तत्व सनातन और सर्वव्यापी हैँ  । उनका व्यवहार देश काल परिस्थिति के सापेक्ष होता है । मनुष्य को शरीर शरीर हेतु भोजन की आवश्यकता है  यह नियम शाश्वत है परंतु व्यक्ति को कब कितना और कैसा भोजन करना चाहिए यह परिस्थिति सापेक्ष होता है । अतः नियम बनते समय उक्त तथ्यों का महत्व होता है । देश काल के आधार पर नियम में परिवर्तन भी होते हैं परिवर्तित नियम पालन योग्य होते हैं ।
यदि हम धर्म की कल्पना को आगे ले जाएं तो केवल राज्य और राष्ट्र का नही बल्कि मनुष्य की प्रकृति का विचार करना होगा अर्थात राष्ट्र का संविधान प्रकृतिक न्याय के प्रतिकूल नही होगा ।
ऐसे बहुत से व्यवहार हैं जिनकी नियमावली किसी विधि शास्त्र में नही मिलते परन्तु होते अवश्य हैं । वे नियम लिखित कानूनों से भी अधिक प्रभावी होते हैं । अपने माता पिता का आदर करना चाहिए यह किसी कानून में नहीं लिखा फिर भी समाज आदर करने के लिए आपको बाध्य करेगा । माता पिता का सम्मान न् करने वाले को कोई अच्छा इंसान नहीं कहता ।उन्हें बुरा माना जाता है । यदि ऐसा प्रश्न न्यायालय में भी आ जाये तो न्यायालय भी बच्चों को वयस्क होने तक माता पिता का सम्मान करने के लिए ही कहेगा ।इस प्रकार का विधान जो आधारभूत प्राकृतिक एवम आदिरूप है वही सब वस्तुओं और व्यवहार की नियमानुकूलता तथा वैधता निर्णायक है । इस विधान को ही हमारे यहां धर्म कहा गया है । आंतरिक नियम धर्म का पर्याय हो सकता है परंतु वह धर्म का पूरा भाव प्रकट करने मे असमर्थ है । धर्म की प्रभुता होने के कारण ही हमारे राज्य का आदर्श धर्म राज्य है । राजा धर्म की रक्षा करने के लिए होता है ।जब प्राचीन काल में राजा का अभषेक होता था  तब वह खड़ा होकर कहता था अदण्डयो अस्मि ,!!!!अदण्डयो अस्मि , !!!!!अदण्डयो अस्मि !!!! अर्थात मुझे कोई दंड नही दे सकता । यह वही बात जो पश्चिम का राजा कहता है । राजा के यह कहने पर पुरोहित हाथ में पलास का दंड लेकर उसकी पीठ पर मारता था और कहता था धर्म दण्डयोसि !!!धर्म दण्डयोसि !!!! धर्म दंडयोसि !!!  अर्थात तुम्हारे ऊपर भी दंड है और वह दण्ड धर्म देगा । राजा भागता था तथा वेदी की।परिक्रमा करता और पुरोहित उसकी पीठ पर दण्ड मारता जाता था । तीन चक्कर लगाने के बाद यह विधि समाप्त हो जाती थी । राजा को ज्ञात हो जाता था कि हमारे ऊपर भी दंड है और वह धर्म का दंड है ।
     जनतंत्र में देखा जाए तो वहां जनता ही राजा है तो क्या जनता भी मनमानी कर सकती है ? यह प्रश्न लोग उठा सकते हैं परंतु सच यह है
    
      
        
      कि जनता चाहे जो करे उसे अधिकार तो है परन्तु अधर्म नहीं कर सकती एक बार एक धर्म प्रचारक से लोग प्रश्न पूछ रहे थे । उनका कहना था ईश्वर सर्व शक्ति मान नहीं है ? ईश्वर अधर्म नही कर सकता है। यदि करेगा तो शक्तिमान नही रहेगा । अधर्म शक्ति के बजाय दुर्बलता का प्रतीक है । शक्ति मनमानी में नही बल्कि संयम में है । आतः सर्व शक्तिमान परमेश्वर सम्पूर्ण संयमी और सम्पूर्ण धर्म मय है । ईश्वर का जन्म हमेशा अधर्म के विनाश और धर्म की स्थापना हेतु होता है । ईश्वर सब कुछ करेगा परंतु अधर्म नही करेगा । अर्थात स्पष्ट है कि ईश्वर से भी बड़ा धर्म है। जहां भी धर्म राज्य स्थापित होगा वहां सहज रूप से एकात्म दर्शन होगा । 
धर्म राज्य का अर्थ थियोक्रेटिक स्टेट नहीं हो सकता । इसे अच्छी प्रकार समझना आवश्यक है । थियोक्रेटिक स्टेट का अर्थ होता है जहाँ किसी पंथ अथवा गुरु का राज्य होता है। एक ही पन्थ विशेष के लोगों के पास सभी अधिकार होता है परंतु अन्य पन्थ के लोगों के पास अधिकार नहीं होता है । उन्हें मात्र दोयम दर्जे की नागरिकता भर ही प्राप्त हो पाती है । रोमन साम्राज्य इसी आधार पर चलता था । खिलाफत के पीछे भी यही कल्पना थी । खलीफा के नाम पर ही दुनिया भर के मुसलमान बादशाह राज्य करते थे किन्तु यह खिलाफत प्रथम विश्व युद्ध के बाद समाप्त हो गई । अब उसे पुनः करने का प्रयत्न किया जा रहा है । पाकिस्तान् एक थियोक्रेटिक बना है । वे अपने को इस्लामी राज्य कहते हैं । वहां मुसलमानों को छोड़कर अन्य जो भी हैं वे सब दोयम दर्जे के नागरिक हैं। इसके अतिरिक्त इस्लामी शासन का कोई और रूप तो वहां नहीं दिखता है । कुरान मस्जिद रोज़ा ईद नमाज़ आदि जैसी  वहां है वैसी ही हिंदुस्तान में भी है । अर्थात राज्य और मजहब को जोड़ने की आवश्यकता नहीं है इससे व्यक्ति का व्यक्ति का ईश्वर करने का सामर्थ्य नही बढ़ता बल्कि राज्य अपने कर्तव्यों से अवश्य च्युत हो जाता है । धर्म राज्य में यह नही होता । प्रत्येक को अपने सम्प्रदाय की पूर्ण स्वतंत्रता रहती है । धर्म राज्य व्यक्ति के विकास उसके सुख और शांति में सम्प्रदाय का स्थान स्वीकार करता है । राज्य का कर्तव्य है कि वह ऐसी अवस्थाएं पैदा करे जिसमे व्यक्ति अपने मतानुसार जीवन यापन कर सके । अपने मत की स्वतंत्रता से दूसरे के मत के प्रति सहिष्णुता  अपने आप आती है । 
       स्वतन्त्रता की भी अपनी सीमाएं व मर्यादाएं है । हमें मात्र उतनी ही स्वतन्त्रता हासिल है जहां तक किसी और कि स्वतंत्रता बाधित न् हो । जैसे ही मेरी स्वतन्त्रता में किसी प्रकार का संघर्ष उतपन्न होता है वहीं से हमारी स्वतन्त्रता समाप्त हो जाती है । इसी तरह प्रत्येक व्यक्ति के सम्प्रदाय की स्वतंत्रता है ।  किन्तु कोई मजहब वहीं तक स्वतन्त्र है जब तक कि कोई दूसरा मजहब कोई हस्तक्षेप नही करता । यदि कोई दूसरे सम्प्रदाय में हस्तक्षेप करता है तो निश्चय ही वह स्वतन्त्रता का दुरुपयोग कर रहा है ।इस प्रकार की मर्यादाएं हर स्थान पर रहेंगी ।धर्म के राज्य में मजहब की स्वतंत्रता है पर थियोक्रेटिक स्टेट में नही है । आजकल थियोक्रेटिक स्टेट के विरुद्ध सेक्युलर स्टेट शब्द का प्रयोग होता है । यह शब्द पश्चिमी सभ्यता से नकल करके लिया गया है । हमें इसकी आवश्यकता ही नही थी । इसके कुछ गलत अर्थ लगा लिए गए है । जैसे रिलीजन का अनुवाद धर्म किया गया उसी प्रकार सेक्युलर स्टेट का अनुवाद लोगों ने अधार्मिक राज्य के रूप में किया गया । कुछ लोगों ने कहा धर्महीन राज्य और कुछ लोगों ने उस शब्द को अच्छा करने का प्रयत्न किया तो उन्होंने धर्म निरपेक्ष राज्य का नाम दिया । परंतु ये सारे अनुवाद पूर्णतया गलत हैं क्यों कि राज्य तो धर्महीन हो ही नही सकता धर्म निरपेक्ष भी नही रह सकता ठीक उसी प्रकार जैसे अग्नि ताप निरपेक्ष नही रह सकता । राज्य का कार्य ही यह होता है कि धर्म की व्यवस्था रहे । समाज मे धर्म (ला आफ आर्डर ) रहे वह धर्मसे अलग कैसे रह सकता है । अतः धर्म निरपेक्ष राज्य का मतलब नियम हीन् राज्य होगा ।  जहाँ नियम ही नही है वहां राज्य का कोई अर्थ भी नही । अर्थात धर्म निरपेक्ष और और राज्य एक दूसरे के विरोधी ही हुए । राज्य तो धर्म राज्य ही हो सकता है दूसरा नही । दूसरे में तो मूल कर्तव्य की उपेक्षा होना तय है ।
      कभी कभी यह बहस देखा जाता है कि विधान मंडल बड़ा है या न्याय पालिका बड़ी है । एक कहता है हम कानून बनाते हैं तो दूसरा कहता है हम व्यख्या करते हैं । वास्तव में ये दोनों बड़े नही होते बल्कि इन दोनों के ऊपर बैठा हुआ धर्म बड़ा होता है । विधायिका को धर्मानुसार कार्य करना होगा और न्याय पालिका को भी धर्मानुसार कार्य करना होगा । उसके अंदर इनकी मर्यादाएं होंगी । यहां सबसे बड़ा न् विधायिका को न् न्याय पालिका को और न् जनता को रखा गया है बल्कि धर्म इन सबसे बड़ा है । कोई व्यक्ति धर्म के विरुद्ध आचरण नही कर सकता है ।
              द्वितीय विश्व युद्ध में जब हिटलर ने फ्रांस पर आक्रमण किया तो फ्रांस उसका सामना नही कर पाया । हिटलर की सेनाएं आगे बढ़ती चली गईं । उस फ्रांस के प्रधानमंत्री मार्शल पेतां ने आत्म समर्पण का निर्णय लिया । फ्रांस की जनता ने इसका समर्थन किया । किन्तु दिगाल भागकर लन्दन गया  लन्दन ने दिगाल का समर्थन किया उसने कहा मैं इस समर्पण को स्वीकार नही करता फ्रांस स्वतन्त्र है और स्वतन्त्र रहेगा । वहां वैठ कर सरकार बनाई और पुनः फ्रांस स्वतन्त्र हुआ । अब यदि बहुमत का नियम ही धर्म मानकर चलें तो दिगाल को कभी ठीक नही कहा जा सकता । उसे लड़ने का अधिकार मात्र इस वजह से मिला क्योकि राष्ट्र बहुमत व जनता से बड़ा होता है । राष्ट्र का धर्म इन सबसे ऊपर है । उसने जिस तत्व से अधिकार प्राप्त किया वह थी फ्रांस की स्वतंत्रता ।स्वतन्त्रता प्रत्येक राष्ट्र का धर्म है । 
    शासन कौन चलाएगा यह बहुमत से तय होता है परंतु सत्य क्या है यह कभी बहुमत से तय नही हो सकता । राजा कौन बनेगा यह बहुमत से तय होगा पर राजा क्या करेगा यह धर्म से तय होगा । हम सभी जानते हैं कि  अमेरिका जैसा देश जहाँ प्रजातन्त्र का ही बोलबाला रहा है वहां अब्राहम लिंकन ने गलत जनमत को स्वीकार नहीं किया । लिंकन से जब दक्षिण के राज्यों ने कहा कि हम अलग हो जाते हैं क्यों कि वहां दास प्रथा को समाप्त किया गया था । उस वक्त लिंकन ने लोगों से कहा "यह आपको जनतांत्रिक अधिकार है कि आप अलग हो जाएं " । लिंकन ने लड़ाई लड़ी और उन्हें अलग नहीं होने दिया । दास प्रथा को भी नहीं चलने दिया । यह कभी नहीं कहा कि यदि आप आंशिक दास प्रथा मान लेंगे तो समझौता कर लेंगे । आधा तेरा आधा मेरा वाली नीति कभी नही चली । उन्होंने कहा कि अमेरिका की जो परंपरा है यहां का जो धर्म है प्रकृति है जिस आधार पर राष्ट्र निर्माण का प्रयत्न किया जा रहा है दास प्रथा उसके प्रतिकूल है इसलिए दास प्रथा नही रहेगी । जब लोगों ने कहा हम अलग होते हैं तो उन्होंने कहा तुम अलग भी नहीं होने पाओगे । इस पर वहां गृह युद्ध हुआ परंतु लिंकन ने अधर्म के साथ समझौता नही किया ।
           पुराने हिन्दू विवाह में पति पत्नी का सम्बंध उनकी इच्छा पर निर्भर नही करता । एक क्या यदि दोनों भी राजी हो जाएं तो भी तलाक नही दे सकते । उनका आचरण स्वेच्छा से नही धर्म से नियंत्रित होता है । इसी प्रकार राष्ट्र से भी नाता होना चाहिये । कश्मीर के लोग कहें कि हम अलग होते हैं तो यह धर्म के प्रतिकूल होगा । यदि पूरे देश के लोग धर्म के खिलाफ बात करें और तो वह सत्य नही हो सकती परंतु यदि एक व्यक्ति अपनी बात रखे और वह बात धर्मानुसार होगी तो वही व्यक्ति सत्य होगा । क्यों कि सत्य हमेशा धर्म के साथ होता है । उसी में से किसी व्यक्ति को धर्माचरण का ,धर्म के अनुसार कार्य करने का अधिकार प्राप्त हो जाता है । हम अच्छी तरह समझ ले कि बहुमत में या जनता में धर्म नही है । धर्म शांत है । इसलिए प्रजातन्त्र की व्यख्या में जनता का शासन ही पर्याप्त नहीं यह शासन जनता के हित में भी आवश्यक है । जनता के हित का निर्णय धर्म करता है ।जन राज्य जब धर्म राज्य की भूमिका में नहीं होगा तब तक वास्तविक जनतंत्र व प्रजातन्त्र स्थापित ही नही हो सकता है । बिना स्वतन्त्रता व धर्म के धर्म राज्य का अस्तित्व ही नही सम्भव है । इस प्रकार एकात्म मानव दर्शन में धर्म एक अति महत्वपूर्ण कड़ी है।

                           नवीन मणि त्रिपाठी
                                 जी वन -- 28
                               अर्मापुर इस्टेट
                       कानपुर पिन 208009
दूरभाष 9839626686
( आलेख वर्ष 2017 में  अक्टूबर अंक में भाषा यूनिट हिंदी निदेशालय मानव संसाधन मंत्रालय भारत सरकार की   भाषा पत्रिका में प्रकाशित हो चुका है )
     

गुरुवार, 12 अक्तूबर 2017

कुछ अदा छलक उठी है कुछ नज़र से जाम भी

*212 1212 1212 1212*

आपकी ही रहमतों से मिल गई वो शाम भी ।
कुछ अदा छलक उठी है कुछ नज़र से जाम भी ।।
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ढूढ़िये न आप अब मेरे उसूल का चमन । 
दिल कभी जला यहां तो जल गया मुकाम भी ।।
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नज्र कर दिया गुलाब तो हुई नई ख़ता ।
हुस्न आपका बना गया उसे गुलाम भी ।
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जब चिराग जल गए तो फिर शलभ निकल पड़े ।
कुछ शमा के वास्ते हुए हैं कत्ले आम भी ।।
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मिल गयी नई किरन तो वक्त भी बदल गए ।
मुद्दतों के बाद कर गया कोई सलाम भी ।।
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पूछिये न इश्क में किसे मिला है क्या यहां ।
कुछ फकीर हो गए तो कुछ हुए निजाम भी ।।
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खो दिया गुरूर जो अना हुई जुदा जहाँ ।
कर सका वही वहाँ खुदा का एहतराम भी ।।
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दो पलों की दूरियां हैं जिंदगी की मौत से ।
कर रहे वो मुद्दतों का खास इंतजाम भी ।।
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कुछ निशानियाँ भी छोड़ कर चले गए कहाँ ।
पास रह गया मेरे है आपका कलाम भी ।।

             ---नवीन मणि त्रिपाठी
               मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल - मौत के बाद सभी फ़र्ज़ निभाने आये

ग़ज़ल
2122 1122 1122 22
यार  जितने  थे   नए  और   पुराने  आये ।
मौत  के बाद सभी  फर्ज  निभाने  आये ।।

कौन सुनता है यहां जिंदगी की आहट को ।
हौसले  जब  भी  बढ़े लोग मिटाने आये ।।

तीरगी  खूब  सलामत  है  तेरी  बस्ती में ।
वो  अदावत में चिरागों को बुझाने आये ।।

कुछ हुकूमत का नशा और नशा दौलत का ।
होश  उनके भी अभी तक न ठिकाने आये ।।

पेट की आग जलाती है कहाँ तक हम को ।
छोड़ कर  माँ को बहुत दूर कमाने आये ।।

शह्र में हम भी बड़े नाज़ से आये थे मगर ।
दर  बदर  ठोकरें  खाने  के ज़माने आये ।।

न्याय बिकता है यहां रोज़ तिज़ारत होती ।
उसके हिस्से में भी इफ़रात ख़जाने आये ।।

लूट लेते  हैं  अमन  शौक से कुर्सी ख़ातिर ।
वो  चुनावों  में  यहाँ  वोट  भुनाने  आये ।।

जात के नाम  पे छिनतीं  हैं यहां रोजी तक ।
फिर शिगूफ़ों से वो मरहम को लगाने आये।।

ये सियासत है जरा गौर से देखो आलिम।
मुल्क के लोग हैं जो मुल्क जलाने आये ।।

राम  के  साथ  चलाते  हैं  कई  धंधे  अब।
उनकी सीरत के सरे आम फ़साने आये ।।

ये  उमीदें न बिखर जाएं कहीं जनता की ।
कई  कानून   भरोसे   को  उठाने   आये ।।

आज इंसाफ की ख़ातिर हैं भटकती रूहें ।
ख़ाक क़ातिल के सबूतों को जुटाने आये ।।

         --- नवीन मणि त्रिपाठी 
             (मौलिक अप्रकाशित )

ग़ज़ल - पूछते लोग माज़रा क्या है

2122 1212 22
उस से मिलकर तुझे हुआ क्या है ।
पूछते   लोग   माजरा   क्या  है ।।

सच  बताने  पे  आप  क्यूँ   रोये ।
आइने  से  हुई   ख़ता   क्या  है ।।

है तबस्सुम का राज क्या उनके ।
आंख  में गौर  से  पढा  क्या  है ।।

अश्क़   हैं  बेहिसाब  हिस्से  में ।
ज़श्न  के  वास्ते   बचा   क्या  है ।।

इस  तरह  रोकिये  नहीं  मुझको ।
पूछिये  मत   मेरा  पता  क्या है ।।

आप  मतलब  की  बात  करते हैं ।
आपके  साथ   फायदा  क्या  है ।।

छोड़िये  बात  आप  भी  उसकी ।
उसकी बातों में अब रखा क्या है ।।

गर्म चर्चा  है  दिल  है  जलाने की ।
देखिए  फिर  धुँआ  उठा क्या है ।।

जी  रहा   हूँ   तमाम   गर्दिश  में ।
अब  सिवा  इसके  रास्ता क्या है ।।

चाँद   निकलेगा   उस   दरीचे  से ।
आसमाँ  को  तू  देखता  क्या है ।।

           नवीन मणि त्रिपाठी
        मौलिक अप्रकाशित 


ग़ज़ल - वफ़ा के साथ यकीनन है वास्ता मेरा

1212 1122 1212 22
अलग  है  बात  रखा नाम  बेवफा  मेरा ।
वफ़ा  के  साथ  यकीनन है वास्ता मेरा ।।

मेरे  गुनाह  का  चर्चा  है  शह्र  में काफी ।
तमाम   लोग  सुनाते  हैं   वाक्या   मेरा ।।

नज़र नज़र से मिली और होश खो बैठा ।
उसे भी याद है उल्फत का हादसा मेरा ।।

वो आसुओं से भिगोते ही जा रहे दामन ।
पढा जो खत है अभी,था वही लिखा मेरा ।

फ़िजा पेआज रकीबों का हो गया पहरा ।
बढ़ा  रही  हैं  हवाएं  भी  फ़ासला मेरा ।।

गरीब हूँ मैं शिकायतभी क्या करूँ उनकी ।
लड़ेगा  कौन रियासत  से मुकद्दमा मेरा ।।

अदालतों से मुहब्बत की बात मत कीजै ।
मेरे  ज़मीर   से  होगा  ये  फैसला  मेरा ।।

ये दिल सभाल के रखना,मेरीअमानत है ।
करेंगे  याद  कभी आप  फलसफा मेरा ।।

ज़माना  ढूढ  रहा  है  तेरी  निशानी को ।
कफ़न उठा के न चेहरा कहीं दिखा मेरा ।।

             --नवीन मणि त्रिपाठी 
            मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल - न जाने क्या हुआ मुझको जो तुझसे दिल लगा बैठे

तेरे  पहलू  में  आकर  हम  सुकूँ  अपना जला बैठे ।
न जाने क्या हुआ हमको जो दिल तुझसे लगा बैठे ।।

हवाएं भी मुख़ालिफ़ हो  गईं  तूफ़ान  के जैसी ।
कई  थीं  ख्वाहिशें  अपनी  हवाओं  में  उड़ा  बैठे ।।

हुई  है  आज महफ़िल  में  तेरेआने  की  फिर चर्चा ।
यहां पलकें उमीदें दिल जिगर सब कुछ बिछा बैठे ।।

बड़ी उलझी कहानी हो पढूं मैं खाक क्या तुमको ।
मेरी  खामोश  चाहत  पर  सुना  पहरा  लगा बैठे ।।

बड़ी  क़ातिल  निगाहें  हैं  बड़ी कमसिन  अदाएं  हैं ।
तेरी  जुल्फों   के  साये  में , मुकद्दर  आजमा  बैठे ।।

गज़ब ये हुस्न का जलवा लबों पर देखकर जुम्बिश ।
तुम्हारी  शोखियों  पर  आरजू  का  घर बना बैठे ।।

न  पूछो  तुम  कहाँ तक  देख लेती हैं यहां नज़रें ।
तसव्वुर   में   तुम्हारे  हुस्न  से  पर्दा   उठा  बैठे ।।

भरी बोतल सी छलकी जो तुम्हारी आंख से मदिरा ।
बचा  जो  होश  थोड़ा  था  उसे भी हम लुटा बैठे ।।

              -- नवीन मणि त्रिपाठी

ग़ज़ल - चेहरा नहीं पढ़ा गया अब तक उजास में

221  2121  1221  212

ठहरी मिली है  ज़िंदगी  उनके  गिलास में । 
मिलते  कहाँ  हैं लोग भी  होशो हवास में ।।

देकर  तमाम  टैक्स   नदारद  है   नौकरी ।
अमला लगा रखा है उन्होंने  विकास  में ।।

सरकार सियासत में निकम्मी  कही  गई ।
रहते  गरीब  लोग  बहुत  भूँख प्यास  में ।।

बेकारियों   के  दौर से गुजरा हूँ  इस  कदर ।
घोड़ा  ही  ढूढता   रहा  ताउम्र  घास  में ।।

यूँ ही तमाम  कर लगे हैं जिंदगी पे आज ।
रहना  हुआ  मुहाल  है अपने  निवास में ।।

कितने नकाब डाल के मिलने लगे हैं लोग ।
चेहरा नहीं  पढ़ा गया अब तक उजास में ।।

दौलत की ख़ासियत को जरा देखिए हुजूर ।
उलझे  हजार  हुस्न यहां  खास  खास  में ।। 

खुशबू सी आ रही है हवाओं से  बेहिसाब ।
शायद  बहार  होगी  कहीं  आस  पास में ।।

जबसे खुला है मैकदा उनकी गली के पास ।
निकले  शरीफ़  लोग भी महंगे लिबास  में ।।

कड़वी ज़ुबान है तो उसे  भी  सलाम  कर ।
कीड़ें  पड़े  तमाम  हैं अक्सर  मिठास  में ।।

कैसा  हवस  का दौर  है कैसे पढ़े हैं लोग ।
होते  हैं फेल  इश्क़ की पहली कलास में ।।

यूँ  ही  मिली नज़र  थी इरादा भी नेक था ।
मुज़रिम बना गया है कोई फिर कयास में।।

            --नवीन मणि त्रिपाठी
            मौलिक अप्रकाशित

दोहे

दोहे

कामी कुछ बाबा हुए कलयुग  हुआ असीम।
कुछ तो  आशाराम हैं,कुछ  हैं  राम  रहीम।।

हनीप्रीत  जोगन बनी ,अद्भुत उसकी  प्रीत ।
काम वासना बाँट कर,नित नित बदले रीत।।

राधे  माँ  के द्वार  पर, निशदिन  बरसे नेह ।
जाकी जैसी पोटली , ता  पर    तैसी  गेह ।।

कई  तपस्वी  ढूढते ,फूलों  का  मकरन्द ।
अब  रावण  के भेष में, मिलते नित्यानंद ।।

ग़ज़ल

*221  1221  1221  122*

जबसे  खुली  ये आपकी  दूकान  है  बाबा ।
दौलत  पे नज़र आपकी  पहचान  है बाबा ।।

गर  होते  यहां  रोग  सभी  योग से  अच्छे ।
फिर क्यूँ दवा के नामका फरमान है बाबा ।।

काला है  ये मन आपका  काली  है  कमाई ।
महंगा हुआ क्यों आपका ये  ज्ञान है बाबा ।।

अनशन में दिखीआप के हर योगकी ताकत ।
कमजोर बहुत आपकी  ये  जान है  बाबा ।।

सलवार  पहन भाग गए  आप   समर   से ।
निर्दोष   मरे आपका   सम्मान   है   बाबा ।।

इस  राम रहीमा की भी  करतूत अजब है ।
अब  भेड़िया के भेष  में  शैतान  है  बाबा ।।

आशा  का  है  वो राम मगर  काम   बुरा है ।
अपने ही करम से अभी अनजान है बाबा ।।

आरोप  है  गुरुदेव की हत्या में है शामिल ।
कहता है  बड़े नाज़  से  इंशान  है  बाबा ।।

                    ---नवीन मणि त्रिपाठी

ग़ज़ल -था बारिशों का दौर समंदर मचल गया

*221  2121  1221  212*

सारा  चमन गुलाब था अश्कों  में ढल गया ।
था  बारिशों  का  दौर समंदर मचल  गया ।।

रुसवाईयां  तमाम  थीं  दिल में  मलाल  थे ।
देखा जो हुस्न आपका पत्थर पिघल गया ।।

खुशबू   बनी  हुई  है  अभी  तक दयार  में ।
महबूब  मेरा ख्वाब  में आकर  टहल  गया ।।

कैसा नशा था इश्क़ में मदहोशियों के बीच ।
जो भी थे दफ़्न राज़ वो पल में उगल गया।।

जब  मैं जला तो लोग बहुत जश्न में मिले ।
जैसे  किसी नसीब का सिक्का उछल गया ।।

कहता था है ये आग का दरिया न इश्क कर। 
सुनता  हूँ  चैन  भी  तेरा है आजकल गया।। 

कच्ची  सी  बस्तियोंं में हैं  सस्ते जवाहरात ।
कीचड़ के आस पास में देखा कंवल गया ।।

महफ़िलमें क्या नज़र मिली जोआपसे हुजूर।
मुद्दत  के  बाद दिल भी हमारा बहल गया।।

उसने  कहा  था   साथ  निभाएंगे  उम्र  भर ।
इंसान  चन्द  रोज  में  कितना  बदल  गया ।।

मिलती  कहाँ  दुआ  है  मुहब्बत  के वास्ते ।
आई कभी खुशी तो दिवाला निकल गया ।।

वो  जिस्म  था  कि  आग यही  सोचते  रहे ।
जब  भी गया करीब  लहू तक उबल गया ।।

             ,--नवीन मणि त्रिपाठी
                 मौलिक अप्रकाशित


ग़ज़ल -कौन कैसा उड़ रहा देखा करो

2122  2122  212
इस तरह बे फिक्र मत  निकला  करो ।
कुछ ज़माने को भी अब समझा करो।।

है  मुहब्बत   से  सभी  की  दुश्मनी।
ज़ालिमों से मत कभी उलझा  करो ।।

फिर  सितारे  टूटकर  गिरते  मिले ।
आसमा पर भी नज़र  रक्खा करो ।।

कुछ   परिंदे   हो  गए   बेख़ौफ़  हैं ।
कौन  कैसा उड़  रहा  देखा   करो ।।

दाग  दामन  पर लगे  कितने  यहां ।
आइनो  से  भी  कभी  पूछा  करो ।।

वक्तपर अक्सर मुकर जाते हैं लोग ।
आदमी  की बात  को परखा करो ।।

याद रखना है अगर  उसका  सितम ।
दिल के पन्नों में सितम लिक्खा करो।।

लोग   पलकें   हैं   बिछाए   राह   में ।
बेसबब  यूँ   ही  नहीं   परदा   करो ।।

है  अगर  कुछ  भी  सुकूँ  से वास्ता ।
जुर्म   के  बाबत  नहीं   चर्चा  करो ।।

हम  यकीं  करने  लगेंगे  आप  पर ।
आप  मुद्दों  पर  कभी  ठहरा करो ।।

लुट  न  जाए यह खज़ाना हुस्न का ।
उम्र की  दहलीज  पर  पहरा  करो ।।

   नावीन मणि त्रिपाठी
      मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल - चाँद बनकर वो निखर जाएंगे

2122 1122 22
चाँद बनकर वो  निखर  जाएंगे ।
शाम   होते   ही  सँवर  जाएंगे ।।

मुझको मालूम है फ़ितरत उनकी ।
हैं  जिधर आप   उधर   जाएंगे ।।

जख्म परदे में ही रखना अच्छा ।
देखकर  लोग   सिहर   जाएंगे ।।

छेड़िये  मत  वो  कहानी मेरी ।
दर्द   मेरे   भी   उभर    जाएंगे ।।

घूर  कर   देख रहे  हैं  क्या अब  ।
आप  नजरों   से  उतर  जाएंगे।।

वक्त  रुकता  नहीं  है दुनिया में ।
दिन  हमारे  भी  सुधर  जाएंगे ।।

क्या  पता था कि  जुदा होते ही ।
इस  तरह  आप  बिखर जाएंगे ।।

ये   मुहब्बत    है   इबादत   मेरी ।
एक दिन दिल मे ठहर में जाएंगे ।।

इश्क़ पर बात अभी क्या करना ।
इश्क  पर   आप  मुकर जाएंगे ।।

जिद मुनासिब  कहाँ है पीने की ।
आप  तो  हद  से गुजर जाएंगे ।।

बज्म में आ  गए  तो  रुकिए भी।
आज  की  रात  किधर  जाएंगे ।।

               नवीन मणि त्रिपाठी
             मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल-सियाह ज़ुल्फ़ के साये में शाम हो जाये ।

1212 1122 1212 22*
ये ख्वाहिशें हैं कि दिल तक मुकाम  हो जाये ।
सियाह  ज़ुल्फ़   के  साये  में  शाम  हो जाये ।।

हैं मुन्तज़िर सी ये आंखे कभी तू मिल तो सही।
नए   रसूख़   पे   मेरा   कलाम    हो    जाये ।।

बड़े   गुरुर   से   उसने   उठाई    है    बोतल ।
ये  मैकदा  न  कहीं   फिर  हराम   हो   जाये ।।

फिदा है आज तलक वो भी उस की सूरत पर ।
कहीं  न  वो  भी  सनम  का  गुलाम हो जाये ।।

अदा  में  तेज  हुकूमत   की  ख्वाहिशें   लेकर ।
खुदा  करे  कि  वो  दिल  का निजाम हो जाए ।।

किसी  की  बज्म  में आना  है एक दिन उसको ।
मेरे   नसीब   में   वह     एहतराम    हो   जाये ।।

जफ़ा  की  राह  पे  चलने  लगीं   वफ़ाएँ  सब  ।
चलो वफ़ा  का  ये   किस्सा  तमाम  हो  जाये ।।

नावीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल -पता वह चाँद का भी ढूढता है

1222 1222 122
मेरी पहचान खारिज़  कर रहा है ।
जो  मुद्दत  से  मुझे  पहचानता है ।।

खुशामद का हुनर बख़्शा  है रब ने ।
खुशामद  से वो  आगे बढ़ रहा है ।।

जतन कितना करोगे आप  साहब ।
ये भ्रष्टाचार अब  तक फल रहा है ।।

यकीं होता नही जिसको खुदा पर ।
वही   इंसां  खुदा  से   माँगता   है ।।

उसे   ही  डस रहें हैं सांप  अक्सर ।
जो सापों  को  घरों  में पालता है ।।

गया मगरिब में देखो  आज सूरज ।
पता  वह  चाँद  का  भी ढूढता है ।।

मदारी  के  लिए   जो  है  कमाऊ।
वही   बन्दर  हमेशा  नाचता   है ।।

गरीबी में  हुआ जीना है मुश्किल ।
कोई  बाबा  को  बेटी  बेचता  है ।।

नई   सूरत  को  अक्सर  ढूढते  हैं।
यही इंसानियत का फलसफा है ।।

है उनका  दूर  ही  रहना   मुनासिब ।
कहाँ  उन  से   हमारा  वास्ता  है ।।

न जाने क्या  हुआ  है  आदमी को ।
पराये  माल  को   ही  देखता   है ।।

         --- नावीन मणि त्रिपाठी 
             मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल - वह मुहब्बत में फ़ना हो जाएगा

2122 2122 212
मत  कहो हमसे  जुदा  हो  जाएगा ।
वह  मुहब्बत  में  फ़ना हो  जाएगा ।।

इश्क  के  इस दौर में दिल आपका ।
एक  दिन  मेरा   पता  हो  जाएगा ।।

धड़कनो   के   दरमियाँ  है  जिंदगी ।
धड़कनो का सिलसिला हो जाएगा ।।

इस  तरह  उसने  निभाई  है कसम ।
वह   हमारा    देवता   हो  जाएगा ।।

ऐ   दिले  नादां  न  कर  मजबूर  तू ।
वो  मेरी ज़िद पर ख़फ़ा हो जाएगा ।।

पत्थरो को  फेंक कर  तुम  देख लो ।
आब  का  ये कद  बड़ा हो जाएगा ।।

मत निकलिए इस तरह से बेनकाब ।
फिर  चमन में  हादसा  हो  जाएगा ।।

अब अना से बढ़  रहीं  नज़दीकियां ।
रहमतों   से   फ़ासला  हो  जाएगा ।।

                  -- नवीन मणि त्रिपाठी

ग़ज़ल - ज़रा सम्भल के चलो।

*1212  1122  1212  22*
नई  नई  ये  हुकूमत  जरा  सँभल  के  चलो ।
बढ़ी हुई है लियाकत  जरा सँभल  के चलो ।।
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सुना है मुल्क में  खाकर वो पाक  ही  भजते ।
है आप की भी शिकायत जरा सँभल के चलो ।।

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गुनाह  करके  मिटाना हुआ  बहुत  मुश्किल।
नहीं मिलेगी जमानत जरा  सँभल  के चलो ।।

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वो कह गये   हैं  चलाएंगे  हम भी बुलडोजर ।
ये देखिए तो हिमाकत जरा संभल के चलो ।।

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न जिक्र कर  न  ले पंगा  कभी  भी  औरत  से ।
मिली  है खूब हिदायत  जरा  सँभल  के चलो ।।

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कई.  मुकाम  थे  बाबा  को देखिए   हासिल  ।
मिटी  तमाम  नफ़ासत  जरा  सँभल  के चलो ।।

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तलाक   तीन    से   पर्दा   उठा   दिया   उसने ।
तलाक पर है कयामत  जरा  सँभल  के चलो ।।

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घरों   में    नोट   दबाकर   नही.  रखो   वरना ।
है  जोरदार   नदामत   जरा  सँभल के चलो ।।

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उन्हें   है  वोट  से  मतलब  नजर  उसी पर  है । 
है जातिवाद सलामत  जरा  सँभल  के  चलो ।। 

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उगल रहे  हैं  वो  लारा  को  और  चारा   भी ।
उजड़  गई  है  रियासत  जरा  सँभल के चलो ।।

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वो  हेकड़ी  हुई  है  गुम  जो  पत्थरों   की   थी ।
बड़ी है सख़्त अदालत  जरा  सँभल  के  चलो ।।

        नावीन मणि त्रिपाठी 
      मौलिक अप्रकाशित

मंगलवार, 5 सितंबर 2017

ग़ज़ल - आप क्या हैं इसे जानता कौन है

212 212 212 212
पूछिये  मत   यहां   गमज़दा   कौन   है ।
पूछिये    मुद्दतों    से   हँसा   कौन   है ।।

वो तग़ाफ़ुल  में  रस्में  अदा  कर  गया ।
कुछ  खबर  ही  नहीं  लापता कौन है ।।

घर बुलाकर  सनम  ने बयां  कर दिया ।
आप आ  ही गये तो  ख़फ़ा  कौन  है ।।

इस तरह कोई बदला है  लहजा  कहाँ ।
आपके   साथ  में   रहनुमा   कौन  है ।।

आज तो बस  सँवरने  की  हद  हो गई ।
यह  बता  दीजिए  आईना   कौन   है ।।

अश्क़ आंखों से छलका तो कहने लगे ।
ढल   गई  उम्र  अब   पूंछता  कौन  है ।।

यूँ   भटकता  रहा  उम्र  भर   इश्क  में ।
पूछता   रह   गया   रास्ता   कौन    है ।।

मैंने ख़त में उसे जब ग़ज़ल लिख दिया ।
फिर  सवालात  थे  ये  लिखा  कौन है ।।

दीजिये  मत  खुदा  की  कसम बेसबब ।
अब  खुदा  को  यहां   मानता  कौन है ।।

है  जरूरी  तो  घर  तक   चले   आइये ।
आप  क्या  हैं  इसे  जानता   कौन   है ।।

             -- नवीन मणि त्रिपाठी
              मौलिक अप्रकाशित

शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

ग़ज़ल - शायद कोई नशा है यहां इंकलाब में

221 2121 1221 212

आ   जाइये   हुजूर   जरा  फिर  हिजाब  में ।
ठहरी   बुरी   नजर  है  यहां  माहताब  में ।।

बच्चों  की  लाश पर है तमाशा  जनाब  का ।
औलाद  खो   रहे  किसी  खानाखराब  में ।।

अंदाज आपके  हैं बदलते  अना  के  साथ ।
शायद  कोई   नशा  है  यहां  इंकलाब  में ।।

सत्ता मिली  जो आपको  चलने लगे  हैं दौर ।
डूबे   मिले हैं  आप  भी  महंगी  शराब  में ।।

खामोशियों  के  बीच  जफा  फिर जवाँ हुई ।
आंखों  ने अर्ज कर  दिया  लुब्बे लुआब में ।।

यूँ  ही किया  था जुर्म वो दौलत के नाम पर ।
दो  गज जमीं हुई  है मयस्सर  हिसाब  में ।।

पूछा  वतन का हाल मियां खत को भेजकर।
आया न कोई खतभी अभी तक जबाब में।।

अफसर बिके  हैं  खूब  यहां आंख  बन्द है ।
धब्बा  लगा  रहा  है  कोई  आफ़ताब   में ।।

सारा  यकीन  ढह  गया   हालात  देखकर ।
मिलने  लगे  हैं  जुर्म  भी  अपने शबाब में ।।

रहबर  तेरा  गुनाह  भी  दुनियां को है पता ।
छुपता  है  देर तक  नहीं  चेहरा नकाब  में ।।

उतरा  है  रंग  आपका  तीखे  लगे  सवाल ।
हड्डी  मिली  है आपको  जब से कबाब  में ।।

              -- नवीन मणि त्रिपाठी 
               मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल --वो तेरा छत पर बुलाकर रूठ जाना फिर कहाँ

2122 2122 2122 212
वो  तेरा  छत  पर   बुलाकर  रूठ  जाना   फिर  कहाँ ।
वस्ल  के एहसास  पर   नज़रें   चुराना  फिर  कहाँ ।।

कुछ ग़ज़ल में थी कशिश कुछ आपकी आवाज थी ।
पूछता  ही   रह   गया  अगला  तराना  फिर  कहाँ ।।

आरजू   के   दरमियाँ  घायल  न   हो   जाये   हया ।
अब   हया  के   वास्ते  पर्दा   गिराना  फिर   कहाँ ।।

कातिलाना   वार   करती   वो  अदा   भूली   नहीं ।
शह्र  में  चर्चा   बहुत  थी अब निशाना फिर कहाँ ।।

तोड़ते  वो  आइनों   को   बारहा   इस   फिक्र  में । 
लुट  गया  है  हुस्न  का  इतना खज़ाना फिर कहाँ ।।

था   बहुत   खामोश   मैं  जज़्बात  भी  खामोश थे ।
पढ़  लिया  उसने  मेरे दिल  का फ़साना फिर कहाँ ।।

खो  गए  थे  इस  तरह  हम  भी  किसी  आगोश में ।
याद  आया  वो  ज़माना   पर  ठिकाना   फिर कहाँ ।।

उम्र  की  दहलीज  पर   यूँ  ही   बिखरना  था   मुझे ।
वो  लड़कपन ,वो  जवानी, दिन  पुराना  फिर  कहाँ ।।

ढल  चुकी  हैं  शोखियाँ  अब  ढल  चुके  अंदाज  भी ।
अब   हवाओं   में   दुपट्टे    का  उड़ाना   फिर   कहाँ ।।

हुस्न   की  जागीर  पर  रुतबा  था  उसका   बेमिसाल।
झुर्रियों  की  कैद  में   अब  भाव   खाना  फिर  कहाँ ।।

मैकदों   की  राह  से  ग़ुज़रा   तो   ये   आया   खयाल ।
शरबती  आंखों  से  अब  पीना   पिलाना  फिर   कहाँ ।।

            नवीन मणि त्रिपाठी
            मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल - जिस्म था क्या मेरा खेलने के लिए

इक  नज़र  क्या  उठी  देखने  के लिए ।
चाँद  छिपता  गया  फासले  के  लिए ।।

कोई   सरसर   उड़ा  ले   गई  झोपड़ी ।
सोचिये  मत  मुझे   लूटने    के  लिए ।।

मौत मुमकिन  मेरी  उसको आना ही है ।
दिन  बचे   ही  कहाँ   काटने  के  लिए ।।

जहर  जो  था   मिला  आपसे  प्यार में ।
लोग    कहते   गए   घूँटने   के   लिए ।।

रात  आई   गई   फिर   सहर  हो   गई ।
याद   कहती  रही  जागने   के    लिए ।।

जब   रकीबो   से  चर्चा   हुई   आपकी ।
फिर  पता  मिल  गया  ढूढने  के  लिए ।।

सज के आए हैं महफ़िल में  मेरे सनम ।
इक  नज़र  भर  मेरी  फेरने  के   लिए ।।

कहकशां   से   भी  आवाज़ आई   बहुत ।
चाँद  क्यों  छल   रहा   जीतने के  लिए ।।

यह  बताकर  जरा   तोड़िये दिल  मेरा ।
जिस्म  था  क्या  मेरा  खेलने  के लिए ।।

ग़ज़ल - कसम से वफ़ा की फ़ज़ीहत न होती

122 122 122 122 
अगर  मेरे  दिल  पे  हुकूमत  न  होती ।
तो फिर आपकी भी रियासत न होती ।।

पलट जाती कश्ती  भी  तूफां  में  मेरीे ।
मेरे   पास  उनकी  नसीहत  न  होती ।।

बहुत  कुछ  बदलते फ़िजा के  नज़ारे ।
अगर आपकी कुछ सियासत न होती ।।

जरा सा भी वो थाम  लेते  जो  दामन ।
यहां  आसुओं की  इज़ाफ़त  न होती ।।

वो  मेरा   सुकूँ  भी  मेरे  साथ   रहता ।
अदाओं  में  थोड़ी  शरारत  न  होती ।।

वो इंसाफ करता न अब तक  जहां में ।
कहीं  भी खुदा की  इबादत न  होती ।।

बरसते न बादल भी प्यासी जमीं पर ।
अगर आपकी कुछ इज़ाज़त न होती।।

मुहब्बत के  रिश्ते  न  होते  सलामत ।
तो  फिर ताज जैसी इमारत न होती ।।

यूँ लहरा के जुल्फ़े  न  करतीं नुमाइश ।
तो अहले  चमन  में कयामत न होती ।।

तुम्हें   बेवफा  मान  लेते   जो   पहले ।
कसम से वफ़ा की फ़जीहत  न होती ।।

          -- नवीन मणि त्रिपाठी

ग़ज़ल - माना कि तेरे दिल की इनायत भी बहुत थी

221  1221 1221 122

माना कि तेरे दिल  की  इनायत  भी बहुत थी ।
पर साथ इनायत के हिदायत  भी  बहुत थी ।।

आते  थे  वो  बेफिक्र  मेरे   शहर  में  अक्सर ।
तहजीब  निभाने  की  रवायत  भी  बहुत थी ।।

महंगे  मिले  हैं  लोग  मुहब्बत   के  सफ़र   में ।
यह बात अलग है  कि  रिआयत भी  बहुत  थी।।

चेहरे   को   पढा  उसने कई बार   नज़र   से ।
महफ़िल में तबस्सुम की किफ़ायत भी बहुत थी ।।

वो  हार  गए  फिर  से   अदालत   में   सरेआम ।
हालाकि  नजीरों  की  हिमायत  भी  बहुत  थी ।।

छूटी  हैं  किताबें   भी  वही   उस  से  अभी  तक ।
जिस पर लिखी कुरआन की आयत भी बहुत थी ।।

क्यों   पूछ  रहे  हैं   मेरे  दिल  का   वो   फ़साना ।
उनको तो  मुहब्बत  से  शिकायत भी  बहुत  थी ।।

            ---नवीन मणि त्रिपाठी
             मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल --बदलनी अब तुम्हें सरकार है क्या

1222 1222 122

नया    चेहरा   कोई   दरकार  है  क्या ।
बदलनी अब  तुम्हें  सरकार  है  क्या ।।

बड़ी मुश्किल से रोजी मिल  सकी  है ।
किया  तुमने  कोई  उपकार  है  क्या ।।

सुना  मासूम  की  सांसें   बिकी    हैं ।
तुम्हारा  यह  नया  व्यापार  है क्या ।।

इलेक्शन लड़ गए तुम  जात  कहकर ।
तुम्हारी   बात   का  आधार  है  क्या ।।

यहां  पर  जिस्म  फिर  नोचा गया है ।
यहां  भी  भेड़िया   खूंखार  है  क्या ।।

बड़ी  शिद्दत  से  मुझको  पढ़ रहे हो ।
मेरा चेहरा  कोई  अखबार  है  क्या ।।

हिजाबों   में  खरीदारों  की   रौनक ।
गली में  खुल  गया बाज़ार  है क्या ।।

बहुत  दिन  से कसीदे  लिख  रहे हैं ।
कलम  में आपके  भी धार  है  क्या ।।

कदम  उसके  जमीं  पर अब नहीं हैं ।
हुआ कुछ चांद  का  दीदार  है क्या ।।

तबस्सुम    पर    तेरे   हैरत   हुई   है।
गमों  की  हो   गई  भरमार  है क्या ।।

महज मजहब मेरा  पूछा  था  उसने ।
कहा   तू  देश  का  गद्दार   है  क्या ।।

            नवीन मणि त्रिपाठी
           मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल -मेरी आशिक़ी क्या अमानत नहीं है

122 122 122 122
ख़यानत  की   खातिर  मुहब्बत नहीं है ।
मेरी  आशिकी क्या  अमानत  नहीं  है ।।

नज़र  से हुई  थी  ख़ता  दफ़अतन  जो ।
हमें  उस  ख़ता  से  शिकायत  नहीं है ।।

मिटा   कर   चले   जा   रहे   हैं  उमीदें ।
बची  आप  में  भी  शराफ़त   नहीं   है ।।

चले  आइये  बज़्म   में  रफ़्ता   रफ़्ता  ।
मेरी  आप  से  अब  अदावत  नहीं  है ।।

यकीं कर मेरा   रूठ   कर   जाने  वाले।
मेरे दिल की अब तक इजाज़त नहीं है।।

तेरे  दर  पे आना  मुनासिब कहाँ  अब ।
वहां  आशिकों  की  निज़ामत नहीं  है ।।

शुरूआत  है  ये   बुरे  दिन की  शायद।
दुआवों  से  अब  तो इज़ाफ़त  नहीं है ।।

गुजर जाएंगे मुफ़लिसी के ये  दिन भी ।
बुरा  वक्त  भर  है  कयामत  नहीं   है ।।

करेगा वो  इंसाफ  जुल्मो  सितम  का ।
तुम्हारी   वहां   तो   हुकूमत  नहीं  है ।।

न  उम्मीद रखिये  वफ़ा  की  यहां पर ।
यहां तो  ख़ुदा  की  अक़ीदत  नहीं  है ।।

उसे दिल न देना है कमसिन जिगर  वो ।
मुहब्बत  की  कोई हिफ़ाज़त  नहीं है ।।

जिधर   फेरते  हैं  अदा   से  वो  नज़रें ।
उधर  कोई   बस्ती   सलामत  नहीं  है।।

        ---नवीन मणि त्रिपाठी
          मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल - भूँखे हैं नौजवान कटोरा है हाथ में

221  2121  1221  212
इतनी  जफ़ा  शबाब  पे  लाया  न  कीजिये ।
मुझको   मेरा  वजूद बताया  न   कीजिये ।।

भूखें   हैं   नौजवान   कटोरा   है  हाथ   में ।
थाली किसी के हक़ की हटाया न कीजिये ।।

बेटा  पढा  लिखा  के  वो  नीलाम  हो गया ।
कोटे   की  राजनीति   कराया  न  कीजिये ।।

अब न्याय क्या करेंगे कभी आप  मुल्क  से ।
झूठी तसल्लियाँ  तो  दिलाया   न  कीजिये ।।

कुर्सी  पे  जात  ढूढ  के चेहरा  दिखा  दिया ।
गन्दा  है जातिवाद  सिखाया  न  कीजिये ।।

वो जल रहाहै आजभी मण्डल की आग से ।
देकर  हवाएं   और  जलाया  न  कीजिये ।।

चेहरा बदल  बदल के  नहीं वोट  मांगना ।
अपनी हकीकतों को छुपाया न कीजिये ।।

कैसे   फरेबियों   का    यहां  राष्ट्रवाद   है ।
करते कहाँ हैं न्याय दिखाया  न्  कीजिये ।।

उनकी  गरीबियों  से  उन्हें  वास्ता ही क्या।
अब लाली पॉप दे के फँसाया न् कीजिये ।।

जीते  चुनाव  आप   सवर्णो  के  नाम  पर ।
संसद  में  इनका  दर्द बढ़ाया  न  कीजिये ।।

वादा किया है पास करेंगे वो बिल भी आप ।
कोटे  से  मुल्क  और  मिटाया  न  कीजिये ।।

          नावीन मणि त्रिपाठी
        मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल -बस रात भर की बात थी

2212 2212 2212 2212 

बस रात भर की बात थी , फिर भी रहा पहरा तेरा ।
ऐ  चाँद  तेरी  बज़्म  में  कायम  रहा  रुतबा  तेरा ।।

वो  तीरगी  जाती  रही  रोशन  लगी हर शब मुझे ।
मेरे तसव्वुर  में कभी जब  अक्स  ये  उभरा तेरा ।।

टूटा हुआ तारा था इक हँसता रहा क्यूँ  कहकशां ।
यूँ  ही  जमीं  से  देखता मैं  रह गया  लहज़ा तेरा ।।

देकर गई  है मुफ़लिसी ,कुछ  तज्रिबा भी कीमती ।
मुझको अभी तक याद है ,बख्शा हुआ सदक़ा तेरा।।

है  जिक्र  तेरे  हुस्न  का  ,बाकी  कोई  चर्चा  नहीं ।
है चार  सू  खुशबू  तेरी  छाया  रहा  जलवा  तेरा ।।

रानाइयों  के  फेर में  हम  भी  हरम  में  आ  गए ।
देखा  हया   के  वास्ते  गिरता  रहा  परदा   तेरा ।।

सारा  ज़माना हो  गया दुश्मन  मेरा इस बात  पर ।
कातिल  बनाकर  उम्र भर जारी रहा फ़तबा तेरा ।।

नज़रों की थी ग़फ़लत या फिर वह ख्वाब था मेरा कोई ।
महफ़िल  में चर्चा  है बहुत  आकर  चला .जाना तेरा ।।

मायूस    है    सारा   चमन   मायूस   दीवाने   हुए ।
जब  से  दुपट्टे  में  छिपा  है  चाँद  सा  चेहरा  तेरा ।।

खामोशियों  के बीच से उठने  लगे हैं कुछ सवाल ।
वो मिन्नतें  करता  गया पर दिल नहीं पिघला तेरा ।।

            नवीन मणि त्रिपाठी
           मौलिक अप्रकाशित 
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शनिवार, 29 जुलाई 2017

ग़ज़ल ---बाकी अभी है और फ़ज़ीहत कहाँ कहाँ

221 2121 1221 212
लेंगे   हजार   बार   नसीहत   कहाँ  कहाँ ।
बाकी अभी है और  फ़जीहत कहाँ कहाँ ।।

चलना बहुत  सँभल  के ये  हिन्दोस्तान है ।
मिलती यहां सभी को हिदायत कहाँ कहाँ।।

मजहब कोई बड़ा है तो इंसानियत का है ।
पढ़ते  रहेंगे  आप  शरीअत  कहाँ  कहाँ ।।

वादा  किया  हुजूर  ने  बेशक  चुनाव  में ।
यह बात है अलग कि इनायत कहाँ कहाँ।।

बदलेंगे लोग ,सोच बदल दीजिये जनाब ।
रक्खेंगे आप इतनी  अदावत  कहाँ कहाँ ।।

ईमान   बेचता   है   यहाँ   आम   आदमी ।
करते   रहेंगे  आप   हुकूमत  कहाँ  कहाँ ।।

कैसे   रिहा  हुआ  है  यही  पूछते  हैं सब ।
होती  है पैरवी में किफ़ायत  कहाँ  कहाँ ।।

है देखना तो देखिए  मुफ़लिस की जिंदगी ।
मत देखिए हैं लोग  सलामत  कहाँ  कहाँ ।।

सहमें  हुए  हैं चोर  हकीकत  ये  जानकर ।
आएगी इक नज़र से कयामत कहाँ कहाँ ।।

हालात  देख  के वो  समझने लगे  हैं  सब ।
ये  ग़म कहाँ कहाँ  ये  मसर्रत कहाँ  कहाँ।।

चोरों  को   भी  तलाश  है  ईमानदार  की ।
ढूढा ज़मीर  में  है  सदाक़त  कहाँ  कहाँ ।।

           नवीन मणि त्रिपाठी 
         मौलिक अप्रकाशित